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सोमवार, 21 जून 2010

गीत

गीत : तुम बिन ............

तुम बिन जग से मेले रीते ।
सूने पथ, अंधियारी गलियां, हालाहल सा पीते।

आशाएँ बस खेल खिलातीं,
सपनों की दुनिया दिखलातीं,
और प्रतीक्षा अंत न पाती -
उजड़ा-उजड़ा इक-इक दिन भी, बरस-बरस सा बीते ।

बालू के घर ज्यों ढह जाते,
शंख-सीपियां बह-बह आते,
सतत कहानी कहते जाते -
जीवन भर हम रहे हारते, आंसू ही बस जीते ।

कैसी है इस मन की माया,
जिसने बस तृष्णा को गाया,
पर दुनिया ने ये सिखलाया -
बोलो । सबको मिल पाते हैं, साथ कहां मनचीते ?
* * * * * * * * *

रविवार, 20 जून 2010

गीत प्रेम का...........

काफी समय के बाद फिर हाज़िर हूँ एक पुराना गीत लेकर..........

एक अच्छी खबर ये है कि मेरे परिचय के दायरे में एक उत्साही युवा श्री राजेश कुमार सोनी शामिल हुए हैं। उन्होंने मेरे सारे लेखन को टाइप करने का बीड़ा उठाया है..... इसके लिए उन्होंने काग़ज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों को तक इकट्ठा किया है और उसे टाइप कर रहे हैं...... वे कृतिदेव में टाइप कर रहे हैं जिसे मैं यूनिकोड में परिवर्तित करके आप तक पहुंचाउंगा.......

तो लीजिये प्रस्तुत है ये गीत जो सन १९८९ की किसी धूल भरी गर्मी की ढलती शाम में मेरे भीतर कहीं करवटें लेता हुआ जागा था................

गीत प्रेम का...........
गीत प्रेम का यौवन का अब-
मुझसे नहीं लिखा जाता है।

पीडाओं का बोझा ढोते -
ढोते देह दोहरी हुई है ।
संत्रासों की तेज धूप में
खोती जाती प्यास मुई है ।
दूर-दूर से छिप, कोई क्यों -
अपनी झलक दिखा जाता है ?

कभी उमड़ती अलस भाव से -
कभी क्षितिज में खो जाती हैं ।
कुछ सुधियां ऐसी भी हैं जो-
शांत भाव से सो जाती हैं ।
भूला-भटका मेघ बरस कर,
भाषा नई सिखा जाता है ।

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

गीत: चाहे ना हो ........

चाहे ना हो साथ तुम्हारा,
या हाथों में हाथ तुम्हारा ।
मेरी सांसें तुमको प्रतिक्षण साथ रखेंगी याद बना कर ।।

बचपन की मधुरिम किलकारी,
निश्छल, अर्थहीन सी गारी ।
पल में हास, अश्रु पल भर में
रोना, रूठ मनौवल प्यारी ।
चढ़ना लपक-लपक पेड़ों पर,
और दौड़ना पथ मेड़ों पर ।
कच्ची बेर-बिही का संग्रह
विस्मृत करता दुनिया सारी ।
चाहे बिछड़ा दुख दिखला दो,
या मिलने का सुख सिखला दो ।
अधरों का कंपन खोलेगा, भेद शूल के फूल सजा कर ।।

प्रणय पाठ पढ़ते थे हम-तुम,
बटुक बने घन गुल्मों में गुम ।
आंचल ढरका तो तुम सहमीं
छुई-मुई सी बैठीं गुमसुम ।
लज्जित, मुस्काईं तुम जितनी
मेरी प्रीत बढ़ी तब उतनी ।
और तुम्हारे माथे बरबस-
बिखर-बिखर सा जाता कुमकुम ।
चाहे तुम वे दिन बिसराओ,
या आकर पायल छनकाओ ।
स्मृतियों के सघन कुंज में, मैं बैठा हूं नयन बिछा कर ।।

हाय ! अधूरी मेरी पाती,
मौन बना अब मेरा साथी ।
वर्षा की मदमाती रिमझिम
रोती है, फिर भी बहलाती ।
गीत अबोले से लगते हैं,
जले, फफोले से लगते हैं ।
और तुम्हारी सुधियां मेरे-
भीतर गहरे आती-जातीं ।
चाहे आंखें मुंदती जाएं,
या सपनों के ढेर लगाएं ।
आ पहुंचा है समय विदा का, देखो अपनी नजर बचा कर ।।
* * * * * * * *

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

गीत : तुम मुझसे






तुम मुझसे बस शब्द और सुर ले पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे गीत-?

मुझको तो बस गीत सुनाना आता है,

होंठो पर संगीत सजाना आता है

गहरा रिश्ता है मेरा पीड़ाओं से-

फिर भी मुझको हास लुटाना आता है

तुम मुझको बस आह-कराहें दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे मीत-?

मैंने गीतों में अपनी वह प्यास पढ़ी है-

बरसों से जो प्यास उम्र के साथ चढी है

तृप्त कराने कोशिश जब जब भी हुई है-

तब-तब यह तो और उग्रतर हुई-बढ़ी है

तुम मुझको बस प्यासी तृष्णा दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी प्रीत -?

मैंने जीवन की बगिया में आंसू बोया है

मैंने जिसको चाहा है-बस उसको खोया है

पीड़ा से मेरी आँखें जब-जब भीगी हैं-

तब तब गले लिपट कर मुझसे, गीत भी रोया है।

तुम मुझको बस हार पुरानी दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी जीत -?

मुझे पता है- इन राहों में फूल नहीं हैं,

किंतु बताओ ! कहाँ जगत में शूल नहीं हैं-?

जब शूलों से यारी करना आवश्यक हो-

तब गीतों का साथ बनाना भूल नहीं है।

तुम मुझको बस चंद सलाहें दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी रीत -?

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बुधवार, 15 अक्टूबर 2008

वे आँखें

एक बहुत पुराना गीत
गीत की पृष्ठभूमि ये थी कि मेरी सुगम संगीत परीक्षा का फाइनल वाइवा हो रहा था। मैं लेट हो गया था इसलिए भागा-भागा हांफता हुआ कॉलेज पहुंचा। वहाँ पहुँच कर कुछ प्रकृतिस्थ होने के बाद जब मैंने इधर-उधर देखना शुरू किया तो मुझे इस गीत की प्रेरणा दिखाई दी और वहीं ये गीत लिखा. बाद में मुझे समझ में आया कि इसमें कुछ गलतियां भी हैं पर मैंने उन्हें जान-बूझ कर ठीक नहीं किया. आज २० साल हो रहे हैं फ़िर भी "वे आँखें" आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं।(अब तो हो सकता है उन पर मोटा चश्मा चढ़ गया हो- )
बहरहाल ये गीत पढिये और मेरे साथ अपने अतीत की यात्रा कर लीजिये :

गीत : वे आँखें ........

वे आँखें जितनी चंचल हैं उससे ज्यादा मेरा मन है .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
कभी लजातीं, सकुचातीं सी,
और कभी झुक-झुक जाती हैं .
मुझे देखती हैं वे ऐसे-
धड़कन सी रुक-रुक जाती है .
कह देती हैं सब भेदों को, मौन नहीं हैं, वे चेतन हैं .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
ह्रदय तंत्र को छेड़-छेड़ कर,
मधुर रागिनी वे गाती हैं .
मुझको मुझसे बना अपरिचित-
इंद्रजाल-सा फैलाती हैं .
आंखों ने रच डाला जैसे-एक अनोखा-सा मधुवन है .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
कुछ क्षण मेरे पास बैठ कर-
आँखें दूर चली जाती हैं .
सच कहता हूँ- मुझसे मेरी-
साँसें दूर चली जाती हैं .
आंखों के जाने पर जाना- आंखों में सारा जीवन है .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
इठलाती मदमाती आँखें-
कितना मुझको तरसाती हैं .
सच बोलो-! क्या इन आंखों को-
थोड़ी लाज नहीं आती है-?
वे आँखें क्या नहीं जानतीं-चार दिनों का यह यौवन है-?
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
* * * * * * * * * * * *

शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

एक गीत ;"वे संबोधन----"

वे संबोधन याद करो ।
अपने विगत क्षणों से प्रियतम- थोडा तो संवाद करो ।

अधरों ने विस्मृत करने का
बहुत अधिक आयास किया है ।
किंतु तुम्हारी सुधियों के संग
प्राणों ने वनवास किया है ।
स्वर्णपुरी से अब तो अपने स्वप्नों को आज़ाद करो ।
वे संबोधन याद करो ।

कभी गरजते बादल, लगता
जैसे तुमने मुझे पुकारा ।
सूखे पत्तों पर बूंदों का
राही चल-चल कर हारा ।
मेरे आंसू बह जाएंगे उनका नहीं विषाद करो।
वे संबोधन याद करो ।

जलती तप्त धरा जैसा है
मेरा मन उजडा वीराना।
नव-किसलय की कोमलता को
कभी नहीं उसने पहचाना।
अपनी मधुर हंसी से झरने जैसा कल-कल नाद करो ।
वे संबोधन याद करो ।
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

एक गीतः सोच लेंगे ----

एक गीतः सोच लेंगे ----

सोच लेंगे कोई उलझन आ गई है बिन बुलाए-

हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए ।

तुम तनिक सी बात पर जब रूठते, मुंह फेर लेते,

कांपते अधरों से अस्फुट स्वरों में कुछ बोल देते

तब तुम्हारे गाल पर बिखरी हुई उस लालिमा में-

हृदय के गोपन कलश भी नेह के रंग घोल देते ।

आंसुओं से बोल दो- वे नयन में घर ना बसाएं ।

हम पहुंच जायेंगे तुम तक,क्या हुआ जो तुम ना आए ।

कल नदी ये पूछती थी - किसलिये बेचैन हो तुम १

मूर्तिवत से बैठ,विजड़ित,बन गए दो नैन हो तुम

धड़कनें ही गूंजती हैं, शब्द जैसे खो गए हैं -

वेदना का रूप धारे,ध्वनि रहित से बैन हो तुम ।

हम वहीं बैठे, तुम्हारी राह में पलकें बिछाए -

हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए ।

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शनिवार, 27 सितंबर 2008

गीत : "वे आँखें"

एक बहुत पुराना गीत भेज रहा हूँ । गीत की पृष्ठभूमि ये थी कि मेरी सुगम संगीत परीक्षा का फाइनल वाइवा हो रहा था. मैं लेट हो गया था इसलिए भागा-भागा हांफता हुआ कॉलेज पहुंचा. वहाँ पहुँच कर कुछ प्रकृतिस्थ होने के बाद जब मैंने इधर-उधर देखना शुरू किया तो मुझे इस गीत की प्रेरणा दिखाई दी और वहीं ये गीत लिखा. बाद में मुझे समझ में आया कि इसमें कुछ गलतियां भी हैं पर मैंने उन्हें जान-बूझ कर ठीक नहीं किया. आज २० साल हो रहेहैं फ़िर भी "वे आँखें" आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं.(अब तो हो सकता है उन पर मोटा चश्मा चढ़ गया हो- ) गीत के फॉण्ट का रंग वही है जिस रंग के उसने कपड़े पहन रखे थे. बहरहाल ये गीत पढिये और मेरे साथ अपने अतीत की यात्रा कर लीजिये.

गीत : वे आँखें ........

वे आँखें जितनी चंचल हैं उससे ज्यादा मेरा मन है
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है।

कभी लजातीं, सकुचातीं सी,
और कभी झुक-झुक जाती हैं .
मुझे देखती हैं वे ऐसे-
धड़कन सी रुक-रुक जाती है ।

कह देती हैं सब भेदों को, मौन नहीं हैं, वे चेतन हैं।
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है।

ह्रदय तंत्र को छेड़-छेड़ कर,
मधुर रागिनी वे गाती हैं।
मुझको मुझसे बना अपरिचित-
इंद्रजाल-सा फैलाती हैं।

आंखों ने रच डाला जैसे-एक अनोखा-सा मधुवन है।
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है।

कुछ क्षण मेरे पास बैठ कर-
आँखें दूर चली जाती हैं।
सच कहता हूँ- मुझसे मेरी-
साँसें दूर चली जाती हैं।

आंखों के जाने पर जाना- आंखों में सारा जीवन है।
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है।

इठलाती मदमाती आँखें-
कितना मुझको तरसाती हैं।
सच बोलो-! क्या इन आंखों को-
थोड़ी लाज नहीं आती है-?

वे आँखें क्या नहीं जानतीं-चार दिनों का यह यौवन है-?
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है।

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