भूमिका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भूमिका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 दिसंबर 2013

मिट्टी की गंध और रिश्तों के रंग सहेजने के लिए काफी है “मुट्ठी भर आकाश”
(सुरभि सक्सेना के कविता संग्रह की भूमिका)


      
कविता वैयक्तिक अनुभूतियों और दैवीय चेतना के संगम से उत्पन्न अनुगूँज है । अनुभूतियाँ प्रत्येक जीवंत और संवेदनशील व्यक्ति की संपत्ति होती हैं और जब इन अनुभूतियों के साथ दैवीय चेतना का समन्वय होता है तब कविता जन्म लेती है । यहाँ दैवीय चेतना का अर्थ उस चेतना से है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है और जिसमें विवेक, विश्लेषण-क्षमता और दृष्टा होने की समझ विद्यमान होती है ।
      कविता लिखी या कही नहीं जाती, बल्कि उसका अवतरण होता है; वह नाज़िल होती है । रचनाकार अपने सर्वाधिक सक्रिय, और ऊर्जावान क्षणों में इस अवतरित हो रही; नाज़िल हो रही ऊर्जा को ग्रहण करके उसे शब्दों में बांध कर उसे लौकिक और सर्वकालिक रूप प्रदान करता है । इस दृष्टि से कविता जीवन के समग्र स्वरूपों, सरोकारों और जिजीविषाओं का व्यापक और प्रामाणिक दस्तावेज़ होती है और रचनाकार इस अर्थ में एक ऐसा दृष्टा होता है जो समय को, उसके वर्तमान और भविष्य को, सटीक तरीके से विश्लेषित-व्याख्यायित करता है ।
      समकालीन समय में जहां एक ओर सामाजिक, आर्थिक, वैयक्तिक और यहाँ तक कि बौद्धिक संत्रास घनीभूत होते जा रहे हैं, अनास्था और अविश्वास के दौर में तब एक सुरमई उजास की धुंधली सी किरण कविता में दिखाई देती है । कविता अपनी दिव्य चेतना से मनुष्य को अपने होने की आश्वस्ति देती है और साथ ही सुबह होने का भरोसा भी दिलाती है ।     
      युवा कवयित्री सुरभि सक्सेना के प्रस्तुत प्रथम कविता संग्रह “मुट्ठी भर आकाश” में संग्रहीत कविताओं में जीवन के यथार्थपरक प्रतिबिंब अपने पूरे उत्स के साथ परिलक्षित होते हैं जिनमें मिट्टी की ताज़ा खुशबू और रिश्तों के गाढ़े रंग बहुत खूबसूरती से शब्दों में ढलकर एक ऐसा संसार रचते हैं जो हमारे आसपास ही मौजूद है; हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है और जिसे हम हमेशा महसूस कर रहे होते हैं । यह कविता संग्रह संख्यात्मक रूप से सुरभि का पहला कविता संग्रह है किन्तु इसकी रचनाओं में एक ओर अनुभूतियों की प्रौढ़ ऊँचाइयाँ हैं, दूसरी ओर भावनाओं की गहन गहराइयाँ हैं और इनके साथ-साथ संघर्षों व विद्रूपों की सहज स्वीकार्यता के साथ उन पर विजयी होने की उत्कट अभिलाषा है जो इस संग्रह को समकालीन युवा वाङमय में अनिवार्य और अनदेखा न किया जा सकने योग्य बनाती हैं । 
      सुपरिचित पोलिश फिल्म निर्देशक क्रिस्टोफ़ कियेस्लोव्स्की की तीन रंगों की तिकड़ी (नीला, सफ़ेद और लाल) की फिल्मों की भांति सुरभि के रचना संसार में भी प्रेम, अध्यात्म और अपनी मिट्टी से जुड़ाव के तीन रंग हैं । कियेस्लोव्स्की की दो फिल्में फ्रेंच भाषा में और एक मूल रूप से पोलिश भाषा में बनी थी, सुरभि की कविताओं की भाषा सामान्य हिन्दी होते हुये कुछ कविताओं की भाषा में उर्दू का (“आरज़ू”, “दिल का हाल”, आदि) और कुछ कविताओं में संस्कृत का प्रभाव (“जीवन काव्य”, “जलद प्रणय” आदि) स्पष्ट दिखाई देता है । उसने अपने शब्दों की सृजनात्मक क्षमता पर पूरा भरोसा करते हुये उनसे अपने काव्य विन्यास में अद्भुत शब्द-चित्र गढ़ने का पूरा काम लिया है और अपनी इन कविताओं में आध्यात्मिक गौरव और वर्तमान की विकृतियों के साथ भविष्य का सिंहावलोकन किया है ।
      अपने समूचे रचना-कर्म में सुरभि पूरी सतर्कता के साथ आध्यात्मिक गौरव की बात करते हुये भी आत्म-मुग्ध नहीं हुई और ना ही वर्तमान की विकृतियों और आवश्यक चिंताओं को शब्द-बद्ध करते हुये वह आत्म-ग्लानि से ही पीड़ित हुई । उसने अतीत और वर्तमान के आधार पर भविष्य के सुनहरे, आशापूर्ण और रचनात्मक दिनों की कल्पना की है । उसकी इस कल्पना में कोई अतिशयोक्ति नही है और ना ही स्वयं की क्षमताओं और सीमाओं से परे जाने की असंभव काल्पनिकता ही है । उसका भविष्य का दर्शन, अतीत की नींव पर खड़े वर्तमान के ढांचे पर आकार ले रहे सुंदर भवन की तरह है । “स्वामी विवेकानंद”, “घनश्याम”, “मुरली मनोहर”, “मेनका”, “नीलकंठ” सुरभि की वे कवितायें हैं जिनमें उसकी गहन दृष्टि से भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सामर्थ्य व पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं ।
      सुरभि की कवितायें पढ़ते हुये अनायास ही चिली की सुपरिचित कवयित्री गैब्रीयला मिस्तरल की कविताओं का शिल्प और भाव-भूमि याद आती है । अपनी कविता “सी नोम्ब्र ए ओए” (हिज़ नेम इज़ टुडे) में वे कहती हैं :
            हम बहुत सी गलतियों और
            बहुत से पापों के लिए शर्मिंदा हैं ।
            पर
            हमारा सबसे घृणित अपराध है
            बच्चों का परित्याग
            और इस प्रकार जीवन की गतिशीलता को अनदेखा करना ।

            बहुत सी चीज़ें
            हमारा इंतज़ार कर सकती हैं ।
            पर बच्चे नहीं-

            अब वह समय आ गया है
            जब उसकी हड्डियाँ बनने लगी हैं
            उसकी रगों में खून दौड़ने लगा है
            और उसकी अनुभूतियाँ जागने लगी हैं ।

            उसे हम
            भविष्य के लिए नहीं टरका सकते-
            उसका नाम “आज” है ।                       (भावानुवाद : आनंदकृष्ण)

सुरभि की अनेक भोली-भाली, मासूम कविताओं में भी यह “आज” विभिन्न रूपों में बिखरा हुआ है । कहीं वह “पापा की बेटियाँ” “अदा” और “कोयल” कविताओं में एक छोटी सी बच्ची बन कर उछल-कूद करना चाहती है तो वहीं “आकर्षिता” कविता में अपनी बेटी के रूप में अपना बचपन फिर से खोजते हुये वात्सल्य में डूबती-उतराती है ।
      सुरभि ने अपनी कविताओं में प्रेम को पूरी उष्णता के साथ जिया है । उसने बेबाकी से अपनी बात कही है । प्रेम के अनकहे और अनछुए पहलुओं पर भी उसने ईमानदारी से कलम चलाई है । प्रेम में आकंठ डूबी नायिका के आनंद के मदमाते क्षणों को और वियोग की तपती रेत सी पीड़ा को उसने बड़ी बारीकी से उकेरा है । सुपरिचित लैटिन अमरीकी कवि पाब्लो नेरूदा के एक गीत की पंक्ति है : “कितना संक्षिप्त है प्यार और विछोह की अवधि कितनी लंबी” । नेरूदा प्रेम के, विशेष रूप से वियोग के गायक थे और वैसी ही अनुभूतियों के साथ सुरभि नए शब्द-बंधों को रच रही है ।   उसका प्रेम विरहातुर है किन्तु फिर भी वह “दुख की बदली” नहीं बनी । उसने विछोह के दर्द को सहज रूप में स्वीकार तो किया किन्तु किसी सहानुभूति या दया की उम्मीद किसी से नहीं की । वह अपने मूलभूत अधिकारों के प्रति सचेत रहते हुये जीवंत आत्मीय लगाव और ऊर्जावान हंसी के साथ अपने समग्र जीवन की पड़ताल करती है ।
      सुरभि नैसर्गिक कवयित्री है । वह केवल कवयित्री ही हो सकती थी जो वह हुई । समकालीन वाङमय में जिस स्त्री विमर्श को ले कर हाय-तौबा मची हुई है, उसके सधे हुये, स्पष्ट और व्यावहारिक स्वर सुरभि की रचनाओं में सहज रूप से विद्यमान हैं । अपनी कविता “हस्ती है मेरी” में वह अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती है :
            एक तुम तक नहीं था रास्ता मेरा
            एक तुम ही नहीं थे मंज़िल मेरी
            कुछ और भी मैं पा सकती थी
            एक दौर नया रच सकती थी
इसी कविता में आगे वह कहती है :
            तुम मेरे लिए करते भी क्या.....
            जब अपने लिए कुछ कर पाये ना...
            हाथ में जैसे रेत भरे वक़्त तुम्हारा छूट गया
            मेरे आगे रखा हुआ वो शीशा भी टूट गया ....
            इतनी तो समझ मुझमें भी थी
            एक नई इबारत लिख सकती थी ।
            हाथ बढ़ा, पाना है बहुत कुछ अभी
            जिसके लिए हस्ती है मेरी........

सुरभि सक्सेना की रचना-धर्मिता एक निश्चित दिशा और विचार धारा के साथ निरंतर विकास कर रही है । उसकी कविता अपनी शक्ति, सृजनशीलता, मन और आत्मा को पूरी शिद्दत के साथ रूपायित कर देने को बेचैन प्रतीत होती है । यही बेचैनी दैवीय चेतना के अवतरित होने, नाज़िल होने की पूर्वाशंसा है । समय का, सच्चाई का और विद्रूपों का सामना करते हुये ये कवितायें एक स्पष्ट विकास-धारा की आश्वस्ति देती हैं । इनमें जूझने का माद्दा है, संघर्ष करने की शक्ति है और जीतने का हौसला भी; इसलिए इनको किसी नारेबाजी की ज़रूरत नहीं- । इन दिनों जब रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है तब रिश्तों की अहमियत समझने वाले सुरभि जैसे बिरले रचनाकारों का पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय होना शुभ संकेत देता है । समकालीन दौर को समझने के लिए सुरभि सक्सेना जैसे युवा रचनाकारों को पढ़ा गुना जाना चाहिए । उसका यह पहला कविता संग्रह समाज को नए तरीके से चिंतन करने का अवसर देगा ऐसी आशा की जाना चाहिए । सुरभि को वरिष्ठ गीतकार श्री वीरेंद्र मिश्र की चार पंक्तियों के साथ शुभकामनायें :
            है नहीं प्रतिबद्ध जो उस दर्द का कैसा श्रवण-?
            साधना भर रह गया है गीत का मौलिक सृजन ।
            शिखर पर आलोचना है, केंद्र में संपादकी-
            कौन समझे आज मन की अश्रुकंठी गायकी-?


             ********************************************

सोमवार, 4 मार्च 2013

भूमिका


ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश
(सुनीता शानू के कविता संग्रह “मन पखेरू उड़ चला फिर” पर केन्द्रित)
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
     
   कविता बेचैनी से उपजती है। जितनी घनीभूत बेचैनी होगी उतनी सार्थक कविता भी होगी। यह बेचैनी संवेदनशील व्यक्ति को ही हो सकती है, और संवेदनशील होना मनुष्य की पहली और अनिवार्य शर्त है। इसी लिये धूमिल ने कविता को “भाषा में आदमी होने की तमीज़” कहा है। कविता, गहन पीड़ादायक अनुभवों से गुज़र रहे रचनाकार की सृजनात्मक चीत्कार है। इस प्रकार प्रत्येक रचनाकार दृष्टा होता है क्योंकि वेदना की शक्ति दृष्टि देती है। जो यातना में होता है वह दृष्टा हो सकता है ( अज्ञेयः शेखरः एक जीवनी) ।  इस वेदना को अपनी “सेंसिबिलिटी” से जितनी शिद्दत से महसूस किया जायेगा उतनी ही पारदर्शी और दूरदर्शी दृष्टि से संपन्न कविता प्रस्फ़ुटित होगी।
          सुश्री सुनीता शानू की कविताओं को पढ़ते-गुनते हुए शीतल जल के छींटों-सा ताज़गी भरा अहसास छू-छूकर गुज़रता है। इस जीवंत और स्फ़ूर्त शीतल जल के अंतस में भी गहन पीड़ाएं हैं- पत्थरों से टकराने की पीड़ा, अपने मूलबिंदु से बिछड़ने की पीड़ा, अनजानों के बीच रहने की उत्कंठित पीड़ा, अज्ञात लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने की विवश-पीड़ा; किंतु इन सब पीड़ाओं के साथ जीवन देने की, सुख देने की लालसा; पीड़ा के चीत्कार को मधुर गान में परिवर्तित कर देती है। सुनीता जी की सभी कवितायें इन्ही पीड़ाओं के चीत्कारों और जिजीविषा के मधुरतम गान का संतुलित समुच्चय है। ये कवितायें, इसीलिये समकालिक से आगे बढ़ कर सर्वकालिक हो जाती हैं और मानवीय सरोकारों की सशक्त पैरवी करती हैं। इसी क्रम में उनकी “उसने कहा”, ”मैं रूठ पाऊँ, “सुबह का भूला”, “मलाल”, “इंतजार”, “मुखौटे के पीछे”, खबर: दुनिया बदलने की”, “ए कामवाली- !” जैसी कविताएं विशेष दृष्ट्व्य हैं।
         सुनीता का रचना संसार बहुत व्यापक है। उनकी कवितायें उनके जैसी ही मुखर है और अपने पाठकों व श्रोताओं से सक्रिय व सीधा संवाद करती हैं । कविताओं की यह बहिर्मुखी प्रवृत्ति एक ओर उन्हें ऎकान्तिक अवसाद से बचाती है और दूसरी ओर अपनी कहन को बिना किसी लाग-लपेट के अपने पाठकों को सीधा संप्रेषित कर देती है ।

         सुनीता की कविता जीवंतता की, गति की और अजस्र ऊर्जा की दस्तावेज है। इस संग्रह का पहला ही गीत “ मन पखेरु उड़ चला फिर...” इस जीवन्तता की सघनता और गति की दिशा निर्धारित करता है। यह गीत इस संग्रह का शीर्षक गीत है, जिसमें डूबते-उतराते सुनीता की रचना धर्मिता के विविध आयामों का विहगावलोकन किया जा सकता है। इस गीत में “मन पखेरु” जहां एक ओर आसमान की ऊँचाइयाँ नापने को बेचैन है तो वहीं दूसरी ओर हृदय की गहराइयों में दबी मलिनता की ग्रंथियाँ खोलने को आतुर है । एक साथ बहिर्यात्रा और अंतर्यात्रा का ऎसा संगम विरल ही देखने को मिलता है।
     “पंछी” या “पखेरु” सुनीता का प्रिय प्रतीक है । पंछी या पखेरु; जीवंतता को, गति को, अज्रस ऊर्जा को, जिजीविषा को और उन्मुक्तता और उत्सवप्रियता के विविध बिम्बों को उनकी रचनाओं में रुपायित करता है । इस संग्रह की कुल बारह कविताओं में “पखेरु” ने उड़ान भरी है । ये कविताएं हैं- “मन पखेरु फिर उड़ चला”, “आज होली रे”, “किस पर करूँ विश्वास”,”सुबह का भूला”, “डोर”, “ओढ़ा दी चुनर”, “गीतिका: ये कौन है”, “गीतिका: प्यार में अक्सर”, ”मन पखेरु”, ”प्रेम बंधन”, “मै अपना घर ढूँढती हूँ”, और ”पंछी तुम कैसे गाते हो” । इन कविताओं में सुनीता के पंछियों- पखेरुओं ने जीवन के मौलिक बिम्ब गढ़े हैं । एक सफ़ल, सार्थक और सक्षम प्रतीक की खोज, सुनीता की बहुत बड़ी उपलब्धि है।
                    सुनीता की रचनाओं का मूल स्वर “प्रेम” है। वे प्रेम के विविध आयामों की अनुगायिका हैं। प्रेम को उन्होने व्यष्टि से समष्टि और अणु से ब्रह्माण्ड तक पहुंचाया । ऎहिक और दैविक प्रेम का चित्रण करने में वे बहुत सफ़ल रही हैं। उनके प्रेम का कैनवास बहुत व्यापक है, जिसमें बचपन के घरौंदे, कच्ची इमली, नीम, पीपल, बरगद, अमलतास, से लेकर माँ, पिता, पुत्र, पति और मित्रों को भी बहुत आत्मीयता और निश्छलता के साथ विषय बनाया गया है । प्रकृति के प्रति  उनके प्रेम ने “अमलतास” जैसी महत्वपूर्ण कविता दी है, तो प्रेम के आध्यात्मिक और पारलौकिक आयाम ने उन्हें “दर्द का रिश्ता” कविता रचने के लिये प्रेरित किया है । पूरी बेबाकी और ईमानदारी के साथ उन्होने प्रेम के ऎहिक, ऎन्द्रिक और सांसारिक स्थूल स्वरूप पर भी कलम चलाई जिससे “प्रिय बिन जीना कैसा जीना”, “तुम्हारी चाहत”, “श्याम सलोना”, जैसी कविताएं निः सृत हुई। प्रेम का वियोग पक्ष भी उनकी कविताओं में बड़ी समर्थ ध्वनि के साथ गुंजित हुआ है।
                    प्रस्तुत संग्रह “मन पखेरु उड़ चला फिर” सुनीता शानू का पहला काव्य संग्रह है। इसे पढ़ते हुए यह सुखद आश्चर्य होता है कि यह संग्रह किसी अन्य रचनाकार के पहले संग्रह में आने वाली भाव, भाषा, शिल्प, संयोजन, बिम्ब व प्रतीक विधान, अनुभूति, सम्प्रेषण आदि की बड़ी और गंभीर त्रुटियों से लगभग पूरी तरह से मुक्त है। वास्तव में वे समकालिक दौर की बेहद सतर्क और चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी काव्यधारा में प्रेम की शीतल फुहारें हैं तो समकालीन विद्रूपों के खिलाफ विद्रोह के तीखे तेवर भी दिखाई देते हैं। उनकी सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ सुपरिचित पोलिश कवयित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का की याद दिलाती है । शिम्बोर्स्का की भांति सुनीता जी की रचनाओं में बड़ी-बड़ी थोथी व सैद्धान्तिक बातों का अभाव और मर्मस्पर्शी शब्द चित्रों का बाहुल्य है। जो खामोश ज्वालामुखी शिम्बोर्स्का की रचनाओं में धधकता है, उसकी गहरी आँच सुनीता की रचनाओं में भी मिलती है। जहाँ एक ओर शिम्बोर्स्का अपनी कविता “डिस्कवरी” में कहती है-
        मै शामिल होने से इंकार करने में विश्वास करती हूँ
        मै बर्बाद जीवन में विश्वास करती हूँ
        मै कर्म में खर्च हुए समय में विश्वास करती हूँ
        मेरी आस्था अडिग है-
        -अंधी और निर्लिप्त।
वहीं सुनीता शानू अपनी कविता “जीना चाहती थी मैं” में पूछती है-
        “दीमक भी पूरा नही चाटती
         ज़िंदगी दरख्त की
         फिर तुमने क्यों सोच लिया
         कि मै वजह बन जाऊँगी
         तुम्हारी साँसों की घुटन
         तुम्हारी परेशानी की
         और तुम्हें तलाश करनी पड़ेगी वजहें
         गोरख पांडॆ की डायरी या फिर
         परवीन शाकिर के चुप हो जाने की।
         ये सच है मैं जीना चाहती थी
         तुमसे माँगी थी चंद सांसें-
         वो भी उधार।“
           सुनीता ने अपनी कविताओं में उस दुनिया को प्रस्तुत किया है जो सामान्य जन की दुनिया है। इस दुनिया मे प्रेम है, संघर्ष है, भूख है, अभाव है और इन सबके साथ आत्मीय उत्सव-धर्मिता है। उनकी कवितायें सामान्य जन के सरोकारों से जुड़े प्रश्न सीधी-सरल भाषा में पूरी सादगी के साथ उठाती हैं। उनकी कविताओं में हर्ष-उल्लास, उम्मीद-हताशा, जीवन, मृत्यु, यथार्थ, संशय, प्रकृति, आस्था जैसे भावों के साथ मानवीय संवेदनाओं का आश्वस्त करता हुआ उष्ण स्पर्श भी है। वे जीवन के जयघोष का उत्सव मनाती हैं किन्तु इस उत्सव में वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति भी पूर्णतः सचेत हैं। उनकी समग्र चिंताएँ मानव-मात्र के लिए हैं।
           “स्त्रीविमर्श”  समकालीन वाङमय में महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रुप में तेजी से उभरा है हालाकिं इसकी जड़ें बहुत गहरे तक और बहुत दूर तक  फैली हुई है। एक जागरूक रचनाकार के रुप में सुनीता ने भी स्त्रीविमर्श पर अपने मौलिक तर्कों और मान्यताओं के साथ चिंतन किया है। निष्कर्षतः स्त्री विमर्श पर उनका सुस्पष्ट, सुचिंतित मौलिक दर्शन उनकी कविताओं मे निरायास ही उतर आया है। वे स्त्री के स्त्रीत्व की गरिमा से गौरवान्वित है किंतु  स्त्रीविमर्श के नाम पर स्त्री को तमाशा बनाने के खिलाफ हैं। उनके दृष्टिकोण, उनकी कविताओं- “तो फिर प्यार कहाँ हैं”, “तुम ऎसे तो न थे”, “मेरे मालिक”, “डोर”, “चिह्न”, “कन्यादान”, “माँ”, “तुम कैसी हो”, “मै तनहा नही हूँ”, “श्याम सलोना”, “गरीब की बेटी”, “तुम्हारे लिये”, “ऎ कामवाली”, आदि कविताओं में परिलक्षित होता है।
           इसी क्रम में मै इस संग्रह की रचना “जन गीत: कोई शिल्पकार यहाँ आएगा” का उल्लेख अलग से तथा विशेष रूप से करना चाहूँगा। यह असाधारण लंबी कविता पूरी मानव सभ्यता के प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक के दौरान स्त्रीविमर्श की गहरी पड़ताल करती है और सारे विद्रूपों, विसंगतियों, प्रताड़नाओं और संघर्षों का संयत चित्रण करते हुए नई आस्था और विश्वास स्थापित करती है। इस रचना के लिये केवल यही कहा जा सकता है कि ऎसी रचनाएं “लिखी” नही जाती, “लिख” जाती है। यह कविता संदेश देती है कि हम पूर्वजों की गलतियों को मिटा नही सकते पर किसी न किसी तरीके से उनका प्रायश्चित करके उन्हें हलका अवश्य कर सकते हैं। पारंपरिक स्त्री विमर्श के पक्षधर तथा स्त्रीवादी इस कविता की मान्यताओं और स्थापनाओं से नाइत्तफ़ाकी रख सकते है किंतु इस रचना के सिध्द व्यवहारिक दर्शन को नकारा नही जा सकता। इस संदर्भ  में मुझे नथानियल हाथर्न की कालजयी औपन्यासिक कृति “द स्कारलैट लैटर” याद आती है जो सन 1850 में प्रकाशित हुई थी और आज 162 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक बनी हुई है। इस उपन्यास में “बाइबिल”, “पिलग्रिम्स प्रोसेस” आदि पौराणिक व पुरा-ऎतिहासिक ग्रंथो का प्रभाव है। स्त्री विमर्श की प्रारम्भिक रचनाओं में, अनेक असहमतियों के बावजूद, इसका सम्मानीय स्थान है। सुनीता के जनगीत “कोई शिल्पकार यहाँ आएगा” में भी “रामायण”, “महाभारत” जैसे धर्मग्रंथों को आधार बनाकर स्त्री पर यथार्थपरक विमर्श किया गया है। हाथर्न के उपन्यास “द स्कारलेट लैटर” पर कई फिल्में बन चुकी है और सुनीता का यह जनगीत भी संवेदन शील फिल्मकारों के लिये आधारभूमि उपलब्ध कराता है।
            सुनीता की कविताओं का यह पहला संग्रह उनके लिये तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही समग्र हिंदी कविता संसार के लिये भी महत्वपूर्ण है। इस संग्रह में भविष्य की एक दृष्टा और जीवंत कवयित्री की पदचाप सुनाई दे रही है। ये संभावनाओं के स्वर पूर्णतः जीवंत हो सकें और अनंत आसमान को नापने की इच्छा रखने वाला पखेरु अपने लक्ष्य को प्राप्त करे, यही कामना है। ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश करने वाले सुनीता शानू के “मन पखेरु” की यह पहली उड़ान सधी हुई, संतुलित तथा आत्म विश्वास से भरी हुई है। यह आशा की जानी चाहिये कि अपनी इस उड़ान में तथा भविष्य में होने वाली उड़ानों में यह मन पखेरु जीवन के आसमान की नई-नई बुलंदियों तक पहुंचेगा और नए रहस्यों का अन्वेषण करेगा। फिलहाल सुनीता जी के लिये प्रख्यात शायर डॉ बशीर बद्र का ये शेर मुलाहिज़ा फरमाएं...
                चमक रही है परों में उड़ान की खुश्बू।
                बुला रही है बहुत आसमान की खुश्बू।
                                               
कृति का नाम : मन पखेरू उड़ चला फिर
विधा : कविता
रचनाकार : सुनीता शानू
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली
पृष्ठ : 127; मूल्य : 195 रु।

आनंदकृष्ण, भोपाल (म॰प्र॰)
मोबाइल : 9425800818
E-mail : anandkrishan@yahoo.com