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रविवार, 1 मार्च 2020

गीत की आपबीती -3

सोलह बरस की बाली उमर को सलाम ......

(राग अहीर भैरव में प्रेम की उच्चतम अभिव्यक्ति)
(पहली बार फेसबुक वाल पर 08 फरवरी 2019 को प्रकाशित किया )



फरवरी का दूसरा सप्ताह चल रहा है । प्रायः इस समय तक प्रेम की ऋतु वसंत का आगमन हो चुका होता है । यह समय जहां एक ओर प्रकृति के उल्लसित, उन्मादित और मदालस होने का समय है वहीं दूसरी ओर भारतीय परंपरा के वसंतोत्सव और पाश्चात्य परंपरा के वेलेंटाइन डे के उत्सवों का भी समय है । भीषण जाड़े से कंपकपाए प्राणियों और वनस्पतियों के अंतस्थल वातावरण में घुलती हुई हल्की तपिश से जीवंत हो उठते हैं और उनमें ऊर्जा का संचार हो उठता है । एक ओर रंग बिरंगे फूल खिल कर धरती की प्रसन्नता का यशोगान करते हैं तो दूसरी ओर वैसे ही रंग बिरंगे फूल प्राणियों के मन में भी खिल उठते हैं । और ऐसे समय में ही प्रेम अपने सभी रूपों के साथ सारी सृष्टि में विस्तार पाता है ।
हिन्दी फिल्मों में गीतों की समृद्ध परंपरा है । जीवन के प्रत्येक आयाम के लिए फिल्मों में अर्थवान गीत हैं । फिर भी प्रेम गीतों की संख्या सर्वाधिक है । इन गीतों ने प्रेम के सभी क्षेत्रों को शब्द और स्वर दिये हैं । इनकी सूक्ष्म अनुभूतियाँ बहुत अपनत्व के साथ श्रोता को अपने साथ बांध लेती हैं और उसके साथ एकाकार हो जाती हैं । सबके पास अपनी अपनी स्मृतियाँ होती हैं जो वसंत ऋतु में अपनी समग्र चेतना के साथ अंगड़ाइयाँ ले कर टहोकती हैं ।
फिल्म “एक दूजे के लिए” सन 1981 में रिलीज़ हुई थी । यह कमलहासन और रति अग्निहोत्री की पहली हिन्दी फिल्म थी जिसमें उन्होने किशोरावस्था के उछाह भरे निश्छल प्रेम को ऐसी अभिव्यक्ति दी थी कि उस समय का संभवतः प्रत्येक लड़का “वासू” बन गया था और हर लड़की अपने आप में “सपना” को देखने लगी थी । फिल्म के दुखांत पर इस फिल्म की आलोचना हुई थी पर उसका कोई खास असर नहीं हुआ और फिल्म सुपरहिट रही ।
इस फिल्म में आनंद बख्शी के लिखे हुए 5 गीत थे जिन्हें लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने संगीतबद्ध किया था । इन गीतों को स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, एस पी बालासुब्रमण्यम, अनुराधा पोडवाल तथा अनूप जलोटा ने स्वर दिये थे । एस पी बालासुब्रमण्यम की यह पहली हिन्दी फिल्म थी । मुकेश और मोहम्मद रफी के असामयिक निधन से दरिद्र हो चुकी हिन्दी सिने-संगीत की पुरुष आवाज़ की उम्मीद की उज्ज्वल किरण के रूप में एस पी बालासुब्रमण्यम को हाथों हाथ लिया गया । उन्हें इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला । गीतकार आनंद बख्शी को गीत “तेरे मेरे बीच में ...” के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला । फिल्म के सारे गीत सुपरहिट हुए ।
मैं इस फिल्म के उस गीत की बात करूंगा जो फिल्म फेयर के लिए नामित तो हुआ था पर उसे ये पुरस्कार नहीं मिला था । इसका कारण समझ पाने में मैं आज भी असमर्थ हूँ । बहरहाल पहले गीत “सोलह बरस की बाली उमर को सलाम.....” की चर्चा -
इस गीत की प्रारम्भिक दो पंक्तियाँ “कोशिश कर के देख ले ............ बुझती हर चिंगारी ।“ अनूप जलोटा की आवाज़ में हैं । फिर पूरा गीत लता मंगेशकर के दैवी स्वर में जैसे जीवंत हो उठता है । इस गीत में प्रेम की सर्वोच्च स्थिति पर पहुँच कर वहाँ पहुंचाने वाली हर इकाई के प्रति, उसका अवदान याद करते हुए आभार व्यक्त किया गया है । यह प्रेम का वह उच्चतम बिन्दु है जहां सारे राग-द्वेष समाप्त हो जाते हैं, कोई बैर भाव नहीं, कोई लिप्सा नहीं और न ही कोई कामना बची रह जाती है, और शेष रह जाती है प्रेम की दिव्य व अलौकिक अनुभूति, गहन उष्णता और चिरंतन मुक्ति का निस्सीम आकाश -।
इस गीत को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने राग अहीर भैरव में संगीतबद्ध किया था । राग अहीर भैरव दिन के पहले प्रहर का (लगभग प्रातः 6 बजे से 9 बजे तक का) राग है । यह राग भैरव थाट का राग है । इसके आरोह और अवरोह में सात सात स्वर होने के कारण इसकी जाति सम्पूर्ण सम्पूर्ण है । इस राग में ऋषभ (रे) और निषाद (नी) कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध लगते हैं । इस राग का वादी मध्यम (म) और संवादी षड्ज (स) है । इसमें भैरव और खमाज का समावेश होता है । इस राग को राग भैरव और राग काफी या राग भैरव और राग अभीरी का मिश्रण भी माना जाता है । इसका प्रारम्भिक हिस्सा राग भैरव के समान और बाद वाला हिस्सा राग काफी के समान होता है । यह गंभीर प्रकृति का राग है । ख्याल गायकी और तराने के लिए इस राग को सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है । इस शास्त्रीय राग में ख्याल और बड़ा ख्याल की गायकी बहुत लोकप्रिय है । भक्ति रचनाओं, और आध्यात्मिक प्रकार की रचनाओं के संगीत में भी इसका प्रचुरता से प्रयोग होता है । शायद इसी लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने इस गंभीर राग का प्रयोग इस उछलकूद और मस्ती से भरी स्थिति के गीत के लिए किया होगा ।
आइये ! इस गीत में जो “सलाम” छूट गए हैं उन्हें सलाम पेश करते हुए इस गीत को पढ़ें, सुनें और देखें । आनंद बख्शी साहब की कलम को सलाम, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की सांगीतिक सामर्थ्य को सलाम, लता मंगेशकर की "सदाबहार सोलह बरस की बाली उमर" की आवाज़ को सलाम, अनूप जलोटा को सलाम और साथ ही “वासू” और “सपना” को सलाम ................
कोशिश करके देख ले दरिया सारी नदियॉ सारी
दिल की लगी नहीं बुझती बुझती हर चिंगारी
सोलह बरस की ..
सोलह बरस की बाली उमर को सलाम
ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
सलाम ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
दुनियॉ में सबसे पहले जिसने ये दिल दिया
दुनियॉ के सबसे पहले दिलबर को सलाम
दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया
दिल तक पहुँचने वाली डगर को सलाम
ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
सलाम ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
जिसमें जवान होकर बदनाम हम हुए
जिसमें जवान होकर बदनाम हम हुए
उस शहर, उस गली, उस घर को सलाम
जिसने हमें मिलाया, जिसने जुदा किया
उस वक़्त, उस घड़ी, उस गजर को सलाम
ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
सलाम, ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
मिलते रहे यहॉ हम ये है यहॉ लिखा
इस लिखावट की ज़ेरो-जबर को सलाम
साहिल की रेत पर यूं, लहरा उठा ये दिल
सागर में उठने वाली हर लहर को सलाम
इन मस्त गहरी गहरी आखों की झील में
जिसने हमें डुबोया उस भँवर को सलाम
घॅूघट को तोडकर जो सर से सरक गयी
ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम
उलफत के दुश्मनों ने...
उलफत के दुश्मनों ने कोशिश हजार की
फिर भी नहीं झुकी जो, उस नजर को सलाम
ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
सोलह बरस की बाली उमर को सलाम
ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम
सलाम ऐ प्यार तेरी, पहली नजर को सलाम

गीत का वीडियो देखने के लिए ये लिंक क्लिक करें : 
https://www.youtube.com/watch?v=322FOeeonf4
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डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है । इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है । अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
© anandkrishna आनंदकृष्ण
लेखक के द्वारा यह लेख पहली बार फेसबुक पर 08 फरवरी 2019 को प्रकाशित किया गया ।
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शुक्रवार, 17 जनवरी 2020



अनुभव की सामर्थ्य और सचेतना से समृद्ध आशंकाओं की प्रतिध्वनियाँ
(वरिष्ठ कवि राजेन्द्र नागदेव के कविता संग्रह “सुरंग में लड़की” पर केन्द्रित)
-आनंदकृष्ण, भोपाल
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देखो वृक्ष को देखो
वह कुछ कर रहा है
किताबी होगा कवि
जो कहेगा कि
हाय पत्‍ता झर रहा है । (रघुवीर सहाय)
               वरिष्ठ कवि श्री राजेंद्र नागदेव ने अपने ग्यारहवें कविता संग्रह “सुरंग में लड़की” को इन शब्दों के साथ समर्पित किया है : “उन शालेय बच्चों को/ जो अंकों की मैराथन दौड़/ में दौड़ते-दौड़ते ज़िंदगी/ से ही बाहर चले गए ।“ परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद अखबारों की सबसे पीड़ादायक सुर्खियों पर एक क्षण ठिठक कर, अफसोस की एक हल्की सी लहर को अपने भीतर महसूस करते हुए आगे बढ़ जाने वाले आम पाठक को इन पंक्तियों में झलकने वाली पीड़ा की सघनता विचलित कर के उसे भी उसी सुरंग में धकेल सकती है जहा वह अज्ञात अनाम लड़की चली गई है । तब पाठक अचानक आशंकित हो सकता है कि इस अंधेरी सुरंग का एक हिस्सा कहीं वह भी तो नहीं है !
               विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में होने वाली आत्महत्याओं में दस प्रतिशत अकेले भारत में होती हैं । नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार आत्महत्याओं की दर में हर साल चिंताजनक बढ़ोतरी हो रही है । इनमें किशोरों और युवाओं की संख्या ज्यादा है । पिछले 10 वर्षो में 15 से 24 साल के युवाओं में आत्महत्या के मामले 200 प्रतिशत तक बढ़े हैं । ज्यादातर मामलों में अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तो इसके लिए उससे ज्यादा उसकी परिस्थितियां दोषी होती हैं । यह कहीं न कहीं हमारे सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक और पारिवारिक तंत्र की पराजय है । दरअसल संयुक्त परिवार के विघटन के साथ ही व्यक्ति के लिए सामाजिक समर्थन की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं और उसके स्थानापन्न कोई सक्षम व्यवस्था नहीं बन पाई है । सोशल मीडिया के नाम पर एक आभासी दुनिया के मकडजाल में समाज और खास तौर पर किशोर व युवा वर्ग फँसता जा रहा है । शहरीकरण के निरंतर विस्तार के साथ भावनात्मक शून्यता बढ़ी है और भौतिक समृद्धि बढ़ने के बावजूद व्यक्ति अकेला होता जा रहा है । उसे भावनात्मक संबल देने वाला कोई नहीं है । संस्थानों का भी व्यक्ति के जीवन के इस पहलू पर ध्यान नहीं है । स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों में व्यावसायिक मानसिकता और होड़ का माहौल ज्यादा है । यह मान लिया गया है कि निजी जीवन अलग है और पेशेवर जीवन अलग । एक सभ्य समाज और लोक कल्याणकारी राज्य के लिए यह एक शर्मनाक बात है । राजेन्द्र नागदेव ने इस संग्रह के माध्यम से इसी संवेदनशील मुद्दे को टहोका है ।    
               अपने समय और समकालीन जीवन की जटिल संरचना हर कवि को बेचैन रखती है । कभी-कभी यह संरचना अपने कठिनतम रूप में सामने आती है, जहां घटित हो रहे समय और आगामी घटित होने वाले समय का तटस्थ अनुमान लगाने की अनिवार्यता बाध्य करती है । एक कठिन और विद्रूपित समय के भविष्य की कल्पना करने में नकारात्मक ऊर्जा के सक्रिय होने का खतरा हो सकता है । लगभग आधी सदी के विशाल फ़लक में फैले अपने प्रदीर्घ रचनाकाल में राजेंद्र नागदेव ने भी समय और जीवन की जटिल संरचना के कठिनतम रूप का सामना किया है, किन्तु उनके समर्थ रचनाकार ने नकारात्मक ऊर्जा को हावी नहीं होने दिया । उन की कविताओं का मूल स्वर “आशंका” का है । इस अर्थ में वे “आशंका के कवि” हैं । किन्तु वे निराशावादी नहीं हो पाये । उनकी कविताओं की आशंकाएँ समय को सचेत करती हैं ।
               संग्रह की पहली ही कविता “नदी अब नहीं बहती” प्रकृति और पर्यावरण की गंभीर चिंता को सशक्त रूप में सामने रखती है । इस कविता का एक मार्मिक दृश्य देखें :
पूरा दृश्य अभी है हवा में
पुरानी पड़ती जा रही निगेटिव फिल्म सा
धीरे धीरे कहानी समेट, किसी दिन
फिल्म भी चली जाएगी
नदी की तरह कहीं
लौट कर न आने के लिए
               अपनी आशंकाओं के साथ कवि समय से सवाल भी पूछता है इसी कविता में आगे विनाश की पीड़ा कुछ इस तरह से उभर कर सामने आती है :
पत्तों पर धरे दीप
साँझ की झलमल में अब
कहाँ सिराए जाएँगे ?
कहाँ भरेंगे मेले-?
मांझियों के स्वर कहाँ से उठेंगे ?
कहाँ तक जाएँगे ?
कहाँ से लौटेंगे ?
कहाँ तक लौटेंगे ?
कैसे लौटेंगे ?
नावें रेत पर नहीं चलती ।
               बनी-बनाई वास्तविकता और पिटी-पिटाई दृष्टि को राजेन्द्र नागदेव सिरे से खारिज करते हैं । इस कविता-संग्रह की रचनाओं के माध्यम से वे अपने साथ पाठक को एक ऐसे व्यापक संसार में प्रवेश कराते हैं जहाँ भीड़ का जंगल है जिसमें कवि ख़ुद को खो देना भी चाहता है तो पा लेना भी । वह इस जंगल में फँसा हुआ है लेकिन इस जंगल से निकलना उसे किसी राजनीतिक-सामाजिक शर्त पर स्वीकार्य नहीं है । इससे पहले कवि ने “उस रात चाँद खंडहर में मिला” संग्रह की कविताओं से ख़ुद के होने का अहसास जगाया था । “सुरंग में लड़की” संग्रह में वही अहसास कवि के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा है । इसमें संकलित 51 कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कवि ने एक व्यापकतर संसार में प्रवेश किया है । इन 51 कविताओं में से 19 कवितायें प्रकृति और पर्यावरण की कवितायें हैं उनमें से भी 8 कवितायें चिड़ियों की कवितायें हैं । यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि भारतीय वाङ्मय में चिड़ियों को लड़कियों का प्रतीक बना कर बहुत साहित्य रचा गया है और इस संग्रह में चिड़ियों पर सर्वाधिक कवितायें होने के बावजूद लड़की को शीर्षक बनाया गया है और उसके सदियों से चले आ रहे शोषण के क्रम में एक और नए आयाम की उपस्थिति तलाश की गई है । इस प्रकार समेकित अर्थों में ये कवितायें भीड़ के जंगल से निकलने की छटपटाहट और संघर्ष के प्रतिफलन की अभिलेख बन गई हैं ।
               एक रचनाकार के रूप में राजेन्द्र नागदेव यथार्थ को उसकी संपूर्णता में ग्रहण करने में विश्वास रखते हैं । वे मानते हैं कि यथार्थ की समझ को वे अनुभव और भी अधिक अर्थवान बनाएँगे जो सीधे जीवन से रचना में आविर्भूत होते हैं । वस्तुतः वह विचारशैली किसी रचनाकार का जुड़ाव यथार्थ को संपूर्णता में ग्रहण करने के लिए अनिवार्य है जो विचारशैली सामाजिक यथार्थ को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश करती है तथा सर्वजन के हित में उसे बदलना चाहती है । राजेन्द्र नागदेव इसी रचनात्मकता को स्वीकार करते हैं । इसीलिए आशंकाओं का कवि होते हुए भी, मुखर और वाचाल कवि होते हुए भी उनकी कविता में अर्थवत्ता, जीवंतता और सारगर्भिता है ।
               यह सर्वस्वीकार्य तथ्य है कि जनमानस में वही कवि जीवंत होता है जिसकी कविता कठिन समय में सहानुभूति दे, सहगामी बने और संकट से बाहर निकलने का रास्ता दिखलाये । कविता दरअसल व्‍याख्‍या नहीं मांगती, वह ख़ुद को अनुभव किए जाने का अनुरोध करती है । राजेन्द्र नागदेव ऐसे ही कवि हैं जिनकी कविता में गहन संप्रेषणीयता और व्यापक अनुभव प्रचुर मात्रा में बिखरा पड़ा है । उन की कविता, आमजन की पक्षधर है, इसीलिए वे शब्दों को अपने सृजनकर्म से एक रचनात्मक अनुभव देना चाहते हैं । उनकी कविता में समकालीन समाज के निम्न-मध्यवर्गीय जन की पीड़ा को प्रमाणिक स्वर और गहन मार्मिकता मिलती है । इसके साथ ही उनकी कविता व्यवस्था की निष्ठुरता, और छल के विरुद्ध मुखर हो कर असहमति दर्ज़ कराती है । उन्होने प्रतीकों, बिंबों और मिथकों का भरपूर प्रयोग किया है । साधारण बोलचाल के शब्द उनके स्थायी सहचर हैं । कहीं कहीं लोकभाषा के शब्दों का बखूबी प्रयोग किया गया है । कविताओं की प्रत्येक पंक्ति का सीधा संवाद भी चलता रहता है । इस संवाद के द्वारा ही कविता अपने विशिष्ट अर्थ अपने पाठक को देती जाती है । यही कारण है कि उनकी कविता किसी विशेष खांचे में सिमट कर नहीं आती, बल्कि जीवन और मनुष्य से जुड़े हर सवाल का जवाब बन कर खुलती जाती है । वे  कविता का कविताकरण नहीं करते, बल्कि उसे व्यापक अर्थों में स्वीकृति दे कर उसे मानवीय संदर्भों से जोड़ते हैं । इन सभी अर्थों में “सुरंग में लड़की” कविता संग्रह की कवितायें विचार का एक नया वितान निर्मित करती हैं जहां तमाम आशंकाओं के बावजूद एक धुंधली सी उजास की कोर, एक बड़ी उम्मीद बँधाती है ।
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गुरुवार, 26 अप्रैल 2018


प्रवाह के विपरीत, उद्गम की खोज में गतिमान शब्दों की किश्ती
(संदर्भ : “प्रजापति तथा अन्य कवितायें” रचनाकार – सुधीर देशपांडे)
समीक्षक : आनंदकृष्ण, भोपाल
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आज फिर शुरु हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी सी सरस सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर कर शीतल जल से स्नान किया
आज एक छोटी सी बच्ची आयी
किलक मेरे कंधे पर चढ़ी
आज आदि से अंत तक एक पूरा गान किया
आज जीवन फिर शुरु हुआ ।
                                 (“आज फिर शुरू हुआ” - रघुवीर सहाय)
      सुधीर देशपांडे बहुत लंबे समय से, लगभग 35 वर्षों से कवितायें लिख रहे हैं । किन्तु उनकी कविताओं का पहला संकलन “प्रजापति और अन्य कवितायें” अब आया है । पुस्तक के प्रकाशन के मामले में सुधीर को देर ज़रूर हुई है किन्तु उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह सुखद आश्वस्ति होती है कि किशोरावस्था में भावनाओं के उद्दाम ज्वार को जिस तरह उन्होने सामाजिक सोद्देश्यता की मौलिक अभिव्यक्ति का जरिया बनाया था, वही जज़्बा आज भी उनकी कविता में मिलता है । उन की कविता युगीन सरोकारों की नींव पर ही खड़ी है । वे कथ्य की व्यापकता, दृष्टि के उन्मुक्त विस्तार, ईमानदार अनुभूति के आग्रह, सामाजिक एवं व्यक्तिगत पक्ष के संश्लेषण और रोमांटिक भावबोध के साथ नवीन आधुनिकता से संपन्न भाव-बोध से युक्त एक नया शिल्प गढ़ते हैं । कविता में गद्य की भाषा का सफलतापूर्वक उपयोग, वादमुक्त वैचारिकता, व्यापक स्तर पर स्वाधीन चिंतन की प्रतिष्ठा, अनुभूतियों का बारीक चित्रण, नए प्रतीकों-बिम्बों-मिथकों के माध्यम से समग्र मानववादी धरातल का निर्माण, नया सौंदर्यबोध, और नए मनुष्य की प्रतिष्ठा सुधीर की कविता की विशेषताएं हैं ।
      समाज की अनुभूति कवि की अनुभूति बन कर ही कविता में व्यक्त हो सकती है । सुधीर की कविता इस वास्तविकता को स्वीकार करती है और ईमानदारी से उसकी अभिव्यक्ति करती है । अनुभूति क्षण की हो या समूचे काल की, किसी सामान्य व्यक्ति की हो या विशिष्ट पुरुष की, आशा की हो या निराशा की वह सब सुधीर की कविता का कथ्य है । अपनी कविता के वितरित कैनवास में उन्होने मानव को उसके समस्त सुख-दुखों, विसंगतियों और विडंबनाओं को उसके परिवेश सहित स्वीकार किया है। इसमें न तो छायावाद की तरह समाज से पलायन है और न ही प्रयोगवाद की तरह मनोग्रंथियों का नग्न वैयक्तिक चित्रण या घोर व्यक्तिनिष्ठ अहंभावना । उनकी कविता ईमानदारी के साथ व्यक्ति की क्षणिक अनुभूतियों को, उसकी समस्त पीड़ाओं को संवेदनापूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करती है। संग्रह की प्रतिनिधि कविता “प्रजापति” में वे कहते हैं :
सचमुच प्रजापति ही था वह
जो देता रहा माटी को आकार
जिसके श्रम से सिंचित धारा
भर आंच में ताप कर भी
करती रही
अपने आप को कृतज्ञ
और वह था कि
धरा के आभार मानता रहा ।                              (प्रजापति : पृष्ठ 2)
      सुधीर की कविता में जीवन के प्रति आस्था और जीवन को इसके पूर्ण रूप में स्वीकार करके उसे भोगने की लालसा है । सुधीर ने जीवन को उसके अनंत रूप में देखा है । इसमें कोई सीमा रेखा निर्धारित नहीं की इसलिए उनकी कविता अपने कथ्य और दृष्टि में विस्तार पाती है । वे पेशे से शिक्षक है इसलिए उनके पास अभिव्यक्ति का विस्तृत मनोवैज्ञानिक फैलाव है । उनकी कविता पुराने मूल्यों और प्रतिमानों के प्रति विद्रोही प्रतीत होती है और इनसे बाहर निकलने के लिए व्याकुल रहती है । विचारधारा से अप्रभावित रह कर और अधिक व्यापक मानवीय संदर्भ, उनकी  समस्याएं और विज्ञान के नए आयामों से जुड़ कर सुधीर की कविता ने अपना विषय विस्तार किया है । आम आदमी जिस पीड़ा को झेलता है,औसत आदमी(मध्य-वर्गीय) जिस जीवन को जीता है,वही लघु मानव इन कविताओं का नायक बना है और इसलिए सुधीर की कविता उस लघु मानव की पीड़ा, अभाव और तनाव झेलती है । पिता को केंद्र में रख कर सुधीर ने जो कवितायें लिखी हैं उनमें इसी लघु मानव का प्रामाणिक चित्रण मिलता है । इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठक सहज ही उस लघु मानव के साथ एकाकार हो जाता है । इनमें “रामबाबू (पिता को)”, “पिता के बाद पिता”, “पिता-1”, “पिता-2” “बच्चे बड़े हो रहे हैं”, विशेष रूप से दृष्टव्य हैं । “पिता-1” कविता में वे कहते हैं :
पिता कविता रचते हैं खुद भी
बावजूद इसके कविता से बहुत दूर रहते हैं ।
जैसे रहते हैं अपने में ही
पर अपने से दूर
   माँ पर कविता लिखते कवि
   पिता को भूल जाते हैं अक्सर
         या चाह कर भी
         नहीं बताना चाहते
         अपने बारे में
               पिता लगे रहते हैं
               चुपचाप अपने काम में ।                     (“पिता-1” पृष्ठ 53)
      सुधीर की कविता मानवतावादी है, पर इसका मानवतावाद मिथ्या आदर्श की परिकल्पनाओं पर आधारित नहीं है । उनकी यथार्थ दृष्टि मनुष्य को उसके पूरे परिवेश में परिभाषित करते हुए उसकी उलझी हुई संवेदनात्मक चेतना के विभिन्न स्तरों तक अनुभूत परिवेश की व्याख्या करने की कोशिश करती है। वे मनुष्य को किसी कल्पित सौन्दर्य और वायवीय मूल्यों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके तड़पते दर्दों और संवेदनाओं के आधार पर बड़ा सिद्ध करते हैं । इस बिन्दु पर उनकी कविता मानव मूल्यों की पैरोकार बन कर सामने आती है । एक उदाहरण देखें :
सोच नहीं पाता
तुम्हारी चिट्ठियों के जवाब में क्या लिखूँ ?
कैसे लिखूँ कि
फिक्र मत करो
यहाँ सब ठीक है
जबकि अभी काल निद्रा में सोये हैं तीन जने ।    (चिट्ठियों के जवाब में क्या लिखूँ : पृष्ठ 32)
      सुधीर पेशे से शिक्षक है । उन्होने शिक्षा जगत की विसंगतियों पर भी बेबाक कलम चलाई है । शिक्षा से जुड़े बिंबों को उन्होने सामयिक और युगीन यथार्थ से जोड़ा है । स्वीकारोक्ति, शिक्षा में बजट, बच्चियाँ जो नहीं जातीं स्कूल, आखर, कविताओं में उनका यह कौशल निखर कर सामने आया है । कुछ विशिष्ट कविताओं में मैं सबसे पहले वरिष्ठ कवि राजेश जोशी पर लिखी गई छोटी सी कविता “राजेश जोशी” का उल्लेख करना चाहूँगा । इस कविता में सुधीर का भाषायी सामर्थ्य और सौष्ठव प्रतिबिम्बित होता है । एक अन्य कविता में समकालीन कवि की कविता पढे जाने का उल्लेख है जो सुधीर के अध्ययन के प्रति निष्ठा का रूपांकन करता है ।  
      सुपरिचित आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी ने हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास के संबंध में कहा है – “समकालीन कविता, जीवन और गरबीली गरीबी का काव्य है, जिसमें व्यक्ति की चेतना जीवन के सारे व्यापारों में,खेत-खलिहान में, नगर-गांव में व्यापक धरातल पर व्यक्ति की अनुभूतियों को स्वर देती है ।“ सुधीर ने अपनी कविताओं में अपने शहर, अपने परिवेश, अपने घर परिवार, को बहुत स्नेह और आत्मीयता से याद किया है । प्रसंगतः मैं यहाँ उनकी कविता “तीन पुलिया” का उल्लेख विशेष रूप से करना चाहता हूँ जिसमें तीन पुलिया पर बाढ़ के दृश्य को देखने वाले तीन दोस्त निकले हैं । इस कविता को पढ़ते हुए मैं लगभग 32-33 वर्ष पूर्व के खंडवा में पहुँच गया जहां कवि बनने की आश्वस्ति के साथ तीन किशोर दोस्त, आनंद कृष्ण, सुधीर देशपांडे और तीसरा शायद विवेक श्रीवास्तव, या अजय उपाध्याय या विवेक पुरकर एक ही साइकिल पर सवार हो कर तीन पुलिया पहुंचे थे और वहाँ किनारे खड़े हंसी ठट्ठा कर रहे थे । कविता में बाढ़ का दृश्य, साइकिल, तीनों दोस्त और उनका हंसी-ठट्ठा और उसके माध्यम से समय की नब्ज़ को टटोलने की कोशिश वास्तविक है जिसे सुधीर सपाटबयानी से साफ बचा कर ले गए हैं ।
      समेकित रूप में सुधीर की कविता वास्तव में व्यक्ति की पीड़ा की कविता है । इधर की समकालीन कविता में जहां व्यक्ति के आंतरिक तनाव और द्वंद्वों को वैयक्तिक रूप से व्याख्यायित किया गया है वहीं सुधीर की कविता में वह व्यापक सामाजिक यथार्थ से संपृक्त होता है । अपने अनुभव के सत्य को उन्होने बाहर के संसार के सत्य से जोड़ा है इसीलिए उनकी कविता के सामाजिक सरोकार काफी गहरे हैं और उनका अनुभव का दायरा काफी विस्तृत हो जाता है ।  
      सुधीर की कविता में छंद के प्रति आग्रह नहीं है इसके बावजूद उसमें सहज प्रवाह और गति दिखाई पड़ती है । नाद की ध्वनियाँ वहाँ एक निजी संगीत निर्मित करती है और अर्थ के धरातल पर वहाँ लय के समुच्चय की गूंज उभरती है । ये कवितायें संवाद करती हैं और इनकी मुखरता ही इनका सामर्थ्य है । सुधीर की दृष्टि की व्यापकता, उनसे सार्थक कविताओं की उम्मीद जगाती है और यह संग्रह इस उम्मीद को पूरा करने की दिशा में पहला चरण है । अज्ञेय की कविता “अच्छा खंडित सत्य” की इन पंक्तियों के साथ सुधीर को शुभकामनायें दी जा सकती हैं :
“अच्छा 
खंडित सत्य 
सुघर नीरन्ध्र मृषा से, 
अच्छा 
पीड़ित प्यार सहिष्णु 
अकम्पित निर्ममता से। 

अच्छी कुण्ठा रहित इकाई
साँचे ढले समाज से  
अच्छा 
अपना ठाठ फ़क़ीरी
मंगनी के सुख साज से ।

अच्छा 
सार्थक मौन 
व्यर्थ के श्रवण मधुर भी छंद से ।
अच्छा 
निर्धन दानी का उघड़ा उर्वर दुख 
धनी सूम के बंझर धुआँ घुटे आनंद से ।

अच्छे 
अनुभव की भट्टी में तपे हुए कण दो कण
अन्तर्दृष्टि के, 
झूठे नुस्खे वाद, रूढि़, उपलब्धि परायी के प्रकाश से 
रूप-शिव, रूप सत्य की सृष्टि के।
                (अच्छा खंडित सत्य- "अरी ओ करुणा प्रभामय" : 'अज्ञेय')
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कृति : प्रजापति तथा अन्य कवितायें (कविता)

रचनाकार : सुधीर देशपांडे
प्रकाशक : आरंभ प्रकाशन, खंडवा
मूल्य : 125 रुपये