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बुधवार, 14 जनवरी 2009

एक ग़ज़ल


सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी।

जिंदगी जीने की ऐसी बेबसी अच्छी लगी।

इस नुमाइश ने दिखाए हैं सभी रंजो-अलम-

इस नुमाइश की हमें ये तीरगी अच्छी लगी

हैं वसीले और भी, फितरत-बयानी के, लिए

पर हमें नज्मो-ग़ज़ल, ये शाइरी अच्छी लगी।

आलिमों ने इल्म की बातें बताईं हैं बहुत-

पर हकीकत में हमें दो-चार ही अच्छी लगी।

ख्वाहिशें सबकी कभी पूरी नहीं होतीं मगर-

जो तुम्हारे साथ गुज़री, जिंदगी अच्छी लगी।

आज इन हालत में भी हैं मेरे हमराह वो-

कुछ चुनिन्दा लोग- जिनको रोशनी अच्छी लगी।

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2008

एक ग़ज़ल : गर ज़मीं ........

गर ज़मीं आशियाँ बनाने को-
तो फलक बिजलियाँ गिराने को।

किस तरह से कहें फ़साने को,
हर तरह उज्र है ज़माने को।

हमने चाहा है अश्क मिल जाए-
दर्द अपना कहीं छुपाने को।

उन गुलों को मसल दिया उसने-
जो मिले थे शहर सजाने को।

एक इंसान की ज़रूरत है-
प्यार का दीप फिर जलाने को।

जिसने बारिश की आहटें सुन लीं-
वो ही भागा है घर बचाने को।

कुछ तो उनमें वफ़ा रही होगी-
वो-जो आए हमें मनाने को।

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शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

एक छोटी सी ग़ज़ल

एक छोटी सी ग़ज़ल

गर ज़मीं आशियाँ बनाने को-

तो फलक बिजलियाँ गिराने को।

किस तरह से कहें फ़साने को,

हर तरह उज्र है ज़माने को।

हमने चाहा है अश्क मिल जाए-

दर्द ये अपना कहीं छुपाने को।

उन गुलों को मसल दिया उसने-

जो मिले थे शहर सजाने को।

एक इंसान की ज़रूरत है-

प्यार का दीप फिर जलाने को।

जिसने बारिश की आहटें सुन लीं-

वो ही भागा है घर बचाने को।

कुछ तो उनमें वफ़ा रही होगी-

वो-जो आए हमें मनाने को।

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