शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

एक गीतः सोच लेंगे ----

एक गीतः सोच लेंगे ----

सोच लेंगे कोई उलझन आ गई है बिन बुलाए-

हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए ।

तुम तनिक सी बात पर जब रूठते, मुंह फेर लेते,

कांपते अधरों से अस्फुट स्वरों में कुछ बोल देते

तब तुम्हारे गाल पर बिखरी हुई उस लालिमा में-

हृदय के गोपन कलश भी नेह के रंग घोल देते ।

आंसुओं से बोल दो- वे नयन में घर ना बसाएं ।

हम पहुंच जायेंगे तुम तक,क्या हुआ जो तुम ना आए ।

कल नदी ये पूछती थी - किसलिये बेचैन हो तुम १

मूर्तिवत से बैठ,विजड़ित,बन गए दो नैन हो तुम

धड़कनें ही गूंजती हैं, शब्द जैसे खो गए हैं -

वेदना का रूप धारे,ध्वनि रहित से बैन हो तुम ।

हम वहीं बैठे, तुम्हारी राह में पलकें बिछाए -

हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए ।

* * * * * * * * *

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुंदर।
    'तुम आंखों से दूर रहे पर मन के पास रहे
    जब तक साँस रहे तुमसे मिलने की आस रहे।'
    सोम ठाकुर

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