सोमवार, 1 जून 2009

ग्रीष्म सप्तक

भीषण गर्मी पड़ रही है ......... इस मौके पर सात दोहे प्रस्तुत हैं। ये सभी दोहे अपने आप में स्वतंत्र हैं किन्तु समेकित रूप में ये ग्रीष्म ऋतु के एक पूरे दिन का चित्रण करने का प्रयास हैं...... प्रयास की सफलता का मूल्यांकन आप करेंगे ना-??????
दोहे निकल पड़ा था भोर से पूरब का मजदूर।
दिन भर बोई धूप को लौटा थक कर चूर।

पिघले सोने सी कहीं बिखरी पीली धूप।
कहीं पेड़ की छाँव में इठलाता है रूप।

तपती धरती जल रही, उर वियोग की आग।
मेघा प्रियतम के बिना, व्यर्थ हुए सब राग।

झरते पत्ते कर रहे, आपस में यों बात-
जीवन का यह रूप भी, लिखा हमारे माथ।

क्षीणकाय निर्बल नदी, पडी रेत की सेज।
"आँचल में जल नहीं-" इस, पीडा से लबरेज़।

दोपहरी बोझिल हुई, शाम हुई निष्प्राण।
नयन उनींदे बुन रहे, सपनों भरे वितान।

उजली-उजली रात के, अगणित तारों संग।
मंद पवन की क्रोड़ में, उपजे प्रणय-प्रसंग।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. "पिघले सोने सी कहीं बिखरी पीली धूप।
    कहीं पेड़ की छाँव में इठलाता है रूप।"

    धूप की यह रंगत ! पके हुए गेहूँ , दूर तक फैले खेत। कहीं पेंड़ के नीचे छ्हाँती गोरी । वाह ! क्या शब्द चित्र खींचा आप ने। निदा फाजली और दुष्यंत याद आ गए।

    "पडी रेट" की जगह "पड़ी रेत" होना चाहिए।
    "क्रोड़" क्या होता है।

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  2. आदरणीय गिरिजेश जी,
    आपको दोहे पसंद आये- ये मेरी लेखनी का सौभाग्य है. आपका कहना सही था. "पड़ीं रेट" को मैंने सुधार कर पड़ीं रेत कर दिया है. "क्रोड़" का अर्थ "गोद" होता है. ये तत्सम शब्द है जिसका तद्भव रूप "गोद" है.

    आभार सहित-
    आनंदकृष्ण, जबलपुर

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  3. आनन्द जीं , आपने दोहे के माध्यम से गर्मी के दिन का जो सजीव चिञण प्रस्तुत किया हैँ वो मन को भा गया। और यह सिखाता है कि आने वाले नये कवियोँ को किस प्रकार अपने लेखन मेँ शब्दोँ का चयन करना चाहिये।आप लिखते जाए , मैँ पढ़ता जाऊँ, बस यही कामना हैँ। -: Visit my blog :- ( www.vishwaharibsr.blogspot.com )

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