सोमवार, 21 जून 2010

गीत

गीत : तुम बिन ............

तुम बिन जग से मेले रीते ।
सूने पथ, अंधियारी गलियां, हालाहल सा पीते।

आशाएँ बस खेल खिलातीं,
सपनों की दुनिया दिखलातीं,
और प्रतीक्षा अंत न पाती -
उजड़ा-उजड़ा इक-इक दिन भी, बरस-बरस सा बीते ।

बालू के घर ज्यों ढह जाते,
शंख-सीपियां बह-बह आते,
सतत कहानी कहते जाते -
जीवन भर हम रहे हारते, आंसू ही बस जीते ।

कैसी है इस मन की माया,
जिसने बस तृष्णा को गाया,
पर दुनिया ने ये सिखलाया -
बोलो । सबको मिल पाते हैं, साथ कहां मनचीते ?
* * * * * * * * *

3 टिप्‍पणियां:

  1. sach kitne sachi bat kahi hai

    कैसी है इस मन की माया,
    जिसने बस तृष्णा को गाया,
    पर दुनिया ने ये सिखलाया -
    बोलो । सबको मिल पाते हैं, साथ कहां मनचीते ?

    atyant sundar bhav
    abhivadan

    उत्तर देंहटाएं
  2. तुम बिन... विरह की अत्यंत सुंदर अभिव्यक्ति।
    इंटरनेट के जरिए घर बैठे अतिरिक्त आमदनी के इच्छुक ब्लागर कृपया यहां पधारें - http://gharkibaaten.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं