शनिवार, 6 दिसंबर 2008


साहित्य "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" का अनुगामी बने : ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज।



भारतीय मनीषा में भगवान् आदि-शंकराचार्य का अवतरण एक अलौकिक व विलक्षण घटना है। उन्होंने तत्कालीन समाज में फ़ैली कुरीतियों रूढियों और कुंठाओं को अपने अगाध ज्ञान और विश्वास के बल पर छिन्न-भिन्न कर भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचरण किया. उनके द्वारा प्रदीप्त किया हुआ ज्ञान का अखंड दीप आज भी अपने भरपूर उजास से हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहा है.



दिनांक १२ नवम्बर २००८ का वह पुन्य दिवस था जब मुझे श्री आनंद कुमार मिश्र (जबलपुर) तथा श्री रंगनाथ दुबे (अलाहाबाद) के आत्मीय सहयोग से अलाहाबाद में परम पूज्य अनंत श्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज के पुन्य दर्शन करने व उनके अमृत वचन श्रवण करने का सौभाग्य मिला। महाराजश्री का बाल-सुलभ स्मित हास व उनका सहज व्यवहार मन को गहरे तक छू गया.

महाराजश्री के श्रीचरणों में बैठ कर मैंने अपनी कुछ जिज्ञासाएं और प्रश्न उनके सामने रखे जिनका उन्होंने समाधान किया। चर्चा के दौरान जीवन, जगत और साहित्य से जुडी उनकी चिंताएं अभिव्यक्त हुईं. इस वार्तालाप के संपादित अंश प्रस्तुत हैं.

आनंदकृष्ण : महाराजश्री के श्रीचरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए मैं स्वयं को अत्यन्त गौरवान्वित और सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा हूँ। आज के समय में प्रायः प्रत्येक भारतीय अपने समाज के अतीत के वैभव और वर्तमान की अधोगति को देख कर व्यथित और क्षुब्ध है. इस पतन का कारण क्या है ?

महाराजश्री : भारतीय परम्परा की शिक्षा का अभाव, रहन-सहन, व्यवहार, परिधान में अपनी परम्परा को त्याग कर विदेशियों का अन्धानुकरण, और भौतिकता की और दौड़ना ही वर्तमान में हमारे विघटन औत ह्रास के प्रमुख कारण हैं। हमें फिर से अपनी ही परम्परा को अपनाना होगा, उसे जगाना होगा. आज आपको मेरी बात कटु और अप्रिय लग सकती है किंतु भविष्य में हम सबको सोचना पडेगा कि हम अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी संस्कृति को फिर से अपनाएँ उसे सम्मान देन और उसमें अपनी आस्था जगाये तभी हमारा समाज अपने अतीत के गौरव को पुनः संभाल सकेगा.

आनंदकृष्ण : " साहित्य समाज का दर्पण है" तो आपकी दृष्टि में साहित्य कैसा होना चाहिए-?

महाराजश्री : आपने बहुत अच्छी और ऊंची बात उठाई है। "साहित्य" को अपने व्यापक अर्थ में शब्द की शुद्धि के साथ शब्द की गरिमा, और दार्शनिकता को समेटते हुए उसे सरस बनाने की कला का रूप होना चाहिए. साहित्य में दार्शनिकता होना चाहिए, उसमें एक स्पष्ट दर्शन, और जीवन शैली की सम्यक व्याख्या होना चाहिए. इसके साथ उसमें ऐतिहासिकता हो, जिससे वह साहित्य अपने रचनाकाल के बाद भी प्रासंगिक रहे. उसमें व्याकरण की विधि-सम्मत शुद्धता होना चाहिए और इन सबके साथ उसमें सरसता होना चाहिए.

आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! कृपया बताने की कृपा करें कि ये सारे गुण समाज में होंगे तो साहित्य में आयेंगे या साहित्य में होंगे तो समाज में आयेंगे-?

महाराजश्री : हाँ ! ये आवश्यक है कि साहित्य के द्वारा निर्धारित किए गए आदर्शों का समाज के द्वारा पालन किया जाए और उसका अनुसरण किया जाए और फिर समाज से ये मूल्य साहित्य में स्वतः ही पुनः प्रवेश करते जायेंगे। इस तरह इन शाश्वत मूल्यों का अनंत चक्र चलता रहेगा. साहित्य समाज से भिन्न रह कर नहीं चल सकता और समाज साहित्य से अलग हो कर नहीं रह सकता. दोनों अन्योन्याश्रित हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं. जिस साहित्य का अनुसरण समाज करेगा वही भविष्य का साहित्य कहलायेगा. इसलिए आज के साहित्यकारों से मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि उन्हें सृजन के समय विशेष रूप से सावधानी रखना चाहिए. उनका रचा हुआ एक ग़लत शब्द भयंकर दुष्परिणामों का वाहक हो सकता है. शब्द को इसीलिये तो "ब्रह्म" कहा गया है.

आनंदकृष्ण : जी ! साहित्य को हम किस तरह समाजोपयोगी बना सकते हैं?
महाराजश्री : साहित्य में, जैसा कि मैंने पहले कहा, कि साहित्य में शब्द की शुद्धता, दार्शनिकता, और ऐतिहासिकता के साथ सरसता अत्यावश्यक तत्व हैं. जैसे "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियं" में "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" ये भाग शब्द की शुद्धि, दार्शनिकता, और ऐतिहासिकता का परिचायक है और "न ब्रूयात सत्यमप्रियं" ये साहित्य के परिप्रेक्ष्य में सरसता की और संकेत है.
आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! साहित्य में प्रायः यथार्थ और आदर्श का टकराव दिखाई देता है और यही टकराव समाज में भी दिखता है. कई बार यो यथार्थ होता है उसका आदर्श के साथ ताल-मेल नहीं होता और जो आदर्श होते हैं वे कई बार अव्यावहारिक होते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए-?
महाराजश्री : ! वही "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" । सत्य अर्थात यथार्थ और प्रिय अर्थात आदर्श. दोनों के मध्य समन्वय और संतुलन स्थापित करना आवश्यक है- साहित्य में भी और जीवन में भी. अब जैसे आपने साहित्य की बात की तो साहित्यिक रचनाएं जैसे नाटक हैं, उपन्यास हैं, कविता है- तो बिल्कुल यथार्थ ले कर चलेंगे तो सही होगा क्या-? और इनमें कोरा आदर्श होगा तो उसे कौन पढेगा-? तो आदर्श और यथार्थ में संतुलन होना आवश्यक है. और यह संतुलन बनने की कला ही सच्ची कला है- साहित्य में भी और जीवन में भी.

आनंदकृष्ण : हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के क्या प्रभाव हुए हैं।?

महाराजश्री : मेरा मानना है कि इस देश की राष्ट्रभाषा तो संस्कृत ही है, भले ही उसे घोषित नहीं किया गया है। हिन्दी तो संस्कृत से निकली बोली है. देश के बड़े भू-भाग में हिन्दी बोली जाती है इसलिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने से देश में वैचारिक एकता तो आई है किंतु यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाता तो देश में सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता में और वृद्धि हुई होती.

आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! आप देश की जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे-?

महाराजश्री : साहित्य के माध्यम से हम अपनी संस्कृति का सम्मान करें, उसकी यशोगाथा सुनाएँ और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें. मीडिया को सतर्क रहना चाहिए पिछले दिनों में मीडिया ने " हिंदू आतंकवाद" शब्द बहुत उछाला है. मैं बताना चाहता हूँ कि हिंदू न कभी आतंवादी था और न ही उसकी पृकृति ही आतंकवादी की है. ये झूठे और प्रायोजित प्रचार तत्काल बंद होना चाहिए. देश को, समाज को एक बना कर रखें. भाषा, प्रांत, जाती के नाम पर अलगाववादियों के षड्यंत्रों को समझें और उनसे बचें।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. महाराजश्री के विचार पढ़े बहुत अच्छे लगे, आपने सही प्रश्न अति उत्तम किये हैं, बधाई एक सफ़ल वार्ता के लिये...

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  2. आपके विचारों तक आज पहुच पायी ... बहुत अच्छा लगा ... देर से आये पर दुरस्त आये ... एक सुन्दर ब्लॉग

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