शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

ग़ज़ल

एक छोटी सी ग़ज़ल

गर ज़मीं आशियाँ बनाने को-

तो फलक बिजलियाँ गिराने को।

किस तरह से कहें फ़साने को,

हर तरह उज्र है ज़माने को।

हमने चाहा है अश्क मिल जाए-

दर्द ये अपना कहीं छुपाने को।

उन गुलों को मसल दिया उसने-

जो मिले थे शहर सजाने को।

एक इंसान की ज़रूरत है-

प्यार का दीप फिर जलाने को।

जिसने बारिश की आहटें सुन लीं-

वो ही भागा है घर बचाने को।

कुछ तो उनमें वफ़ा रही होगी-

वो-जो आए हमें मनाने को।

1 टिप्पणी:

  1. 'जिसने बारिश की आहटें सुन लीं
    वो ही भागा है घर बचाने को'
    बहुत ख़ूब!

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