शुक्रवार, 17 जून 2011

आटोग्राफ (कविता)

आटोग्राफ
मैंने
सूखे, हरियाली विहीन
धुप में शान से सर उठाये खड़े
पहाड़ के चित्र पर हस्ताक्षर कर दिए-

अपने आटोग्राफ की तरह-
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बुधवार, 29 दिसम्बर 2010

राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) में मुक्तिबोध रचना शिविर

राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) में "प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान रायपुर के तत्वावधान में दिनांक १७ दिसंबर २०१० से २० दिसंबर २०१० तक आयोजित हुए चार दिवसीय "मुक्तिबोध रचना शिविर" में शामिल होने का अवसर मिला। यह कार्यक्रम वरिष्ठ कविश्री विश्वरंजन जी के मार्गदर्शन और उर्जावान रचनाकार भाई जयप्रकाश मानस और उनके प्रतिबद्ध सहयोगियों के अथक प्रयासों का जीवंत रूप था । इस समारोह की कुछ फोटो देखें।

















इस कार्यक्रम कि विस्तृत रिपोर्ट जल्दी ही ..........















रविवार, 5 सितम्बर 2010

मेरी पहली लघुकथा, जिसे मैंने १९८५ की एक मूसलाधार बारिश भरी शाम में लिखा था.............
अनुत्तरित प्रश्न
संकोच से झुका सिर स्वीकृति में हिला और एक मजबूत बालदार हाथ ने पैंट की जेब से कुछ नोट निकाल कर सामने बैठी धूर्त व मक्कार आंखों के आगे कर दिए । शैतानी चमक के साथ आंखों ने उन नोटों को झपट कर अपने लड़खड़ाते पैरों को बाहर जाने का आदेश दे दिया ।

- दरवाजा चमरौधे सी आवाज करता बंद हुआ और कुछ क्षणों के बाद पुनः खुला - अपने पीछे एक पूर्ण युवा शरीर के अस्तित्व को विमुक्त करता हुआ - सा -
- शरीर के अन्दर आते ही दरवाज़ा अपनी आदत के अनुसार फिर से बंद हो गया..........

- शरीर मशीनी अंदाज़ में अनावृत्त हुआ तब तक सिर का संकोच भी पर्याप्त समाप्त हो चुका था । उसने शरीर को लोलुप दृष्टि से घूरते हुए बातें करना प्रारंभ किया ।

‘‘तुम्हारा नाम - ?’’
‘‘नाम जानकर क्या करोगे ? जल्दी काम निबटाओ जिसके लिए जेब हल्की की है ।’’

‘‘.................... । ’’ कुछ क्षणों का सन्नाटा -

‘‘ तुम यह काम छोड़ क्यों नहीं देतीं - ?’’
‘‘तो क्या होगा ? पेट फिर भी रोटी मांगेगा । फिर यहां नहीं तो कहीं और ...... । ’’
‘‘शादी ............ ?’’
‘‘किससे ............ ?’’
‘‘मुझसे । ’’ सिर पूरे आत्मविश्वास से बोला ।
- अनावृत्त जिस्म का रोयां रोयां व्यंग्य से खिलखिला उठा - ‘‘ शादी तुम करोगे किससे- ? इससे .. ? इससे .... ? या इससे ....... ?’’ जिस्म ने जैसे अपने सारे अंगों की नुमाइश लगा दी ।

- सिर हत्प्रभ रह गया । जिस्म ने खिलखिलाते हुए ही सिर को अपनी ओर खींच लिया और बैड-स्विच आफ कर दिया ।

- सरसराहटें .......... ।
- गुरगुराहटें ........... ।
- गरमाहटें .............. ।

- सन्नाटे में गूंजते झींगुरों की आवाज़-सी सांसें ............ ।
- आवाज़ें दर आवाज़ें -

- सिर चलने को ही था तभी जिस्म से ठंडी आवाज़ उभरी- ‘‘शादी करोगे मुझसे - ?’’

- सिर थम गया । उसके सामने पूरा समाज, परिवार, मित्रमंडली घूम गई और इन सबके बोझ से वह धीरे-धीरे झुकता गया । अचानक वह बिना कुछ बोले बाहर की ओर तेजी से बढ़ गया ।

....... उसका पीछा कर रही है जिस्म की तीखी धारदार खिलखिलाहट - अपने अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ।

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सोमवार, 21 जून 2010

गीत

गीत : तुम बिन ............

तुम बिन जग से मेले रीते ।
सूने पथ, अंधियारी गलियां, हालाहल सा पीते।

आशाएँ बस खेल खिलातीं,
सपनों की दुनिया दिखलातीं,
और प्रतीक्षा अंत न पाती -
उजड़ा-उजड़ा इक-इक दिन भी, बरस-बरस सा बीते ।

बालू के घर ज्यों ढह जाते,
शंख-सीपियां बह-बह आते,
सतत कहानी कहते जाते -
जीवन भर हम रहे हारते, आंसू ही बस जीते ।

कैसी है इस मन की माया,
जिसने बस तृष्णा को गाया,
पर दुनिया ने ये सिखलाया -
बोलो । सबको मिल पाते हैं, साथ कहां मनचीते ?
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रविवार, 20 जून 2010

गीत प्रेम का...........

काफी समय के बाद फिर हाज़िर हूँ एक पुराना गीत लेकर..........

एक अच्छी खबर ये है कि मेरे परिचय के दायरे में एक उत्साही युवा श्री राजेश कुमार सोनी शामिल हुए हैं। उन्होंने मेरे सारे लेखन को टाइप करने का बीड़ा उठाया है..... इसके लिए उन्होंने काग़ज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों को तक इकट्ठा किया है और उसे टाइप कर रहे हैं...... वे कृतिदेव में टाइप कर रहे हैं जिसे मैं यूनिकोड में परिवर्तित करके आप तक पहुंचाउंगा.......

तो लीजिये प्रस्तुत है ये गीत जो सन १९८९ की किसी धूल भरी गर्मी की ढलती शाम में मेरे भीतर कहीं करवटें लेता हुआ जागा था................

गीत प्रेम का...........
गीत प्रेम का यौवन का अब-
मुझसे नहीं लिखा जाता है।

पीडाओं का बोझा ढोते -
ढोते देह दोहरी हुई है ।
संत्रासों की तेज धूप में
खोती जाती प्यास मुई है ।
दूर-दूर से छिप, कोई क्यों -
अपनी झलक दिखा जाता है ?

कभी उमड़ती अलस भाव से -
कभी क्षितिज में खो जाती हैं ।
कुछ सुधियां ऐसी भी हैं जो-
शांत भाव से सो जाती हैं ।
भूला-भटका मेघ बरस कर,
भाषा नई सिखा जाता है ।

शनिवार, 25 जुलाई 2009

पुराने कागजात खंगालने में मिला एक बहुत पुराना गीत भेज रहा हूँ जिस पर तारीख पडी है- १७-११-१९९१ स्थान- भोपाल रेलवे स्टेशन (कोई इंटरव्यू वगैरह देने गया होऊंगा) फिर उसे घर आ कर एडिट किया होगा. इस पर मेरे पूरे हस्ताक्षर हैं जो मैं बहुत कम करता हूँ. ये गीत पूर्णतः अप्रकाशित-अप्रसारित और गुमनाम सा रहा है.

गीत: शब्द वही हैं ....


शब्द वही हैं, बदल गई है केवल अर्थों की भाषा ।
छले हुए स्वप्नों में खोई सूनी आंखों की आशा ।
हवा चूमती थी पागल सी रेतीले नदिया तट को,
जाने किसने झटका था चंदा की आवारा लट को ।
झूम-झूम नर्तन करते थे, नीलगिरि के उंचे पेड़-
बगिया मुस्काई थी सुन-सुन, कर अनजानी आहट को।


अनगिन बिखरे तारों का शामें हंस स्वागत करती थीं ।
नील, निरभ्र, शून्य नभ में नित चटकीले रंग भरती थीं।

पीड़ा के बादल ने आंसू से लिख डाली परिभाषा ।
छले हुए स्वप्नों में खोई सूनी आंखों की आशा ।

जिस दिन बहुत दूर से हमने झलक तुम्हारी पाई थी ।
जिस दिन हमको देख तुम्हारी आंखें भी शरमाई थीं ।
नागपाश जैसी वेणी में बंध-हमने आकाश छुआ-
तन-मन में बिजली सी कौंधी-यौवन की अंगड़ाई थी।

श्वासों के संगम में हमको चेतनता के रंग मिले ।

उड़ते फिरते वनपाखी-से, रूप तुम्हारे संग मिले ।


मन के शिलालेख पर जाने किसने है यह दर्द तराशा ?
छले हुए स्वप्नों में खोई सूनी आंखों की आशा ।
वीराने जीवन को क्षण भर साथ तुम्हारा मिल जाए ।
भटक रही लहरों को जैसे एक किनारा मिल जाए ।
नव पल्लव का स्वागत करने मचल उठें सारी कलियां-
पंखुरियों पर प्रणय गीत हो ऐसा फूल कहीं खिल जाए।

पूनम की रातों में हम-तुम साथ रहें-बस पास रहें ।

और तुम्हारी पलकों में ही खिले खिले मधुमास रहें ।


इस निर्मम दुनिया में मैंने की जब सुख की अभिलाषा ।
छले हुए स्वप्नों में खोई सूनी आंखों की आशा ।

............

बृहस्पतिवार, 23 जुलाई 2009

गीत: चाहे ना हो ........

चाहे ना हो साथ तुम्हारा,
या हाथों में हाथ तुम्हारा ।
मेरी सांसें तुमको प्रतिक्षण साथ रखेंगी याद बना कर ।।

बचपन की मधुरिम किलकारी,
निश्छल, अर्थहीन सी गारी ।
पल में हास, अश्रु पल भर में
रोना, रूठ मनौवल प्यारी ।
चढ़ना लपक-लपक पेड़ों पर,
और दौड़ना पथ मेड़ों पर ।
कच्ची बेर-बिही का संग्रह
विस्मृत करता दुनिया सारी ।
चाहे बिछड़ा दुख दिखला दो,
या मिलने का सुख सिखला दो ।
अधरों का कंपन खोलेगा, भेद शूल के फूल सजा कर ।।

प्रणय पाठ पढ़ते थे हम-तुम,
बटुक बने घन गुल्मों में गुम ।
आंचल ढरका तो तुम सहमीं
छुई-मुई सी बैठीं गुमसुम ।
लज्जित, मुस्काईं तुम जितनी
मेरी प्रीत बढ़ी तब उतनी ।
और तुम्हारे माथे बरबस-
बिखर-बिखर सा जाता कुमकुम ।
चाहे तुम वे दिन बिसराओ,
या आकर पायल छनकाओ ।
स्मृतियों के सघन कुंज में, मैं बैठा हूं नयन बिछा कर ।।

हाय ! अधूरी मेरी पाती,
मौन बना अब मेरा साथी ।
वर्षा की मदमाती रिमझिम
रोती है, फिर भी बहलाती ।
गीत अबोले से लगते हैं,
जले, फफोले से लगते हैं ।
और तुम्हारी सुधियां मेरे-
भीतर गहरे आती-जातीं ।
चाहे आंखें मुंदती जाएं,
या सपनों के ढेर लगाएं ।
आ पहुंचा है समय विदा का, देखो अपनी नजर बचा कर ।।
* * * * * * * *

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

समलैंगिकता और समाज
समलैंगिकता को कानूनी जामा मिलने के बाद हर आम आदमी के मन में उठने वाले सवालों के उत्तरों में आज के उत्तर -आधुनिक हो रहे समाज की कड़वी सच्चाई और घिनौना चेहरा छुपा है.
हमारी प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में कभी कभी बहुत विद्रूपित और अव्यावहारिक बातें देखने मिलती हैं. समलैंगिकता का मसला भी ऐसा ही मसला है. इस फैसले के आने के बाद समाज के जिस "विशेष वर्ग" को राहत पहुंचाने की बात की जा रही थी उसकी प्रतिक्रया तो नहीं मालूम, पर सामान्य रूप से स्कूल कॉलेज के छात्रों में हंसी-मज़ाक, एक दुसरे को छेड़ने और निरर्थक वार्तालाप के विषय के रूप में नया मसाला ज़रूर मिल गया है. समलैंगिकता एक महामारी के रूप में फैलने की चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं पर मुझे लगता है की ये एक महामारी को फैलाने में मददगार होगी. वह महामारी है-ऐड्स. इस फैसले के साथ ऐड्स की आशंकाओं को नज़र-अंदाज़ किया गया है.
हमारे देश में गंभीर और रोंगटे खड़े करने वाली समस्याओं के आसान, मासूम से, और घोर अवैज्ञानिक-अव्यावहारिक समाधान सुझाए जाते हैं. पिच्छले कई वर्षों से ऐड्स की रोकथाम के लिए प्रसारित होने वाले सरकारी विज्ञापन कंडोम के विज्ञापन अधिक लगते हैं. स्थिति ये है की स्कूली बच्चे भी ऐड्स की भयावहता से बेखबर होते हुए कंडोम की सुरक्षा से निश्चिंत हैं. नतीजा वही है जो होना चाहिए था- तमाम प्रयासों के बा-वजूद ऐड्स के रोगियों की संख्या में तेज़ी से बढोत्तरी.
ऐड्स के विज्ञापन में कंडोम की वकालत करने वाले मूर्खों ने देश की स्वस्थ, जीवंत और संभावनाशील पीढी को किस गर्त में धकेल दिया है-!
ऐड्स के प्रति जागरूकता लाने के पक्षधर यदि भारतीय संस्कृति की चारित्रिक शुचिता को पढ़-समझ लेते और उसे व्यावहारिक बनाते तो आज हम ऐड्स के भय से मुक्त स्वस्थ समाज में रह रहे होते-!
और ..........................
उस पर नीम चढा करेला ये की समलैंगिकता भी अब गैर-कानूनी नहीं ....... यानी विदेशी ३-एक्स फिल्मों और इन्टरनेट से प्राप्त ज्ञान के आधार पर नयी रोमांचकता की तलाश में बीमार समाज के निर्माण की गति को तीव्र करने की सार्थक पहल-!!!!!!!
समलैंगिकता को भले ही गैर-कानूनी न माना जाए पर ये अ-सामाजिक और अप्राकृतिक तो है ही......... इसे एक बुराई के रूप में ही देखा जाना चाहिए. इसे कितना ही वैधानिक बनाने की कोशिश की जाए पर समय और समाज इसके पक्ष में कभी नहीं होगा.
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सोमवार, 15 जून 2009

इन दिनों थोड़ी फुर्सत है तो कुछ पुराने कागजात खंगाल रहा हूँ। पुरानी ग़ज़लें और गीत और ......... बहुत कुछ अपनी स्मृतियों के साथ फिर से निकल-निकल कर आ रहे हैं। ........ (चंद तस्वीरे-बुतां, चंद हसीनों के खुतूत, बाद मरने के मिरे घर से ये सामां निकला।)
एक और ग़ज़ल भेज रहा हूँ। इस पर तारीख पड़ी है- 22-09-1991. आप सबकी प्रतिक्रया का इंतज़ार रहेगा.....

एक ग़ज़ल : बाद मुद्दत के .......

बाद मुद्दत के इक हंसी देखी।
एक मजलूम की खुशी देखी।
उनको देखा तो यूँ लगा मुझको-
जैसे बर-बह्र शाइरी देखी।
दिल के हाथों ही हम हुए मजबूर
हमने ऐसी भी बेबसी देखी।

है सितारा बुलंद किस्मत का-
उनकी आँखों में बेखुदी देखी।

नींद- तेरा बड़ा है शुकराना
ख्वाब में हमने आशिकी देखी।

यूँ हुआ इल्म मुक़म्मल अपना-
हमने जब प्यार-दोस्ती देखी।
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सोमवार, 8 जून 2009

"मंच" पर वज्रपात का दिन

आज का दिन "मंच" पर वज्रपात का दिन है। आज की सुबह ह्रदय द्रावक समाचार लाई है. एक सड़क दुर्घटना में मंच के लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड सिंह गुज्जर का निधन हो गया और ओम व्यास तथा ज्ञानी बैरागी गंभीर रूप से घायल हुए हैं.


एक शोक सूचना और- वरिष्ठ रंग-कर्मी हबीब तनवीर का भोपाल में ८६ वर्ष की उम्र में निधन हो गया. रंगमंच की एक महत्वपूर्ण कठपुतली को जगत-नियंता ने वापस बुला लिया.हबीब तनवीर जी, आदित्य जी, नीरज पुरी जी, और लाड सिंह गुज्जर जी को श्रद्धांजलि और ओम व्यास तथा बैरागी जी शीघ्र स्वस्थ हों यही कामना.

एक ग़ज़ल : "गीत गाते रहे.........."

आज कुछ पुराने कागजात खंगालते वक्त एक पुरानी रचना मिली जिस पर तारीख पड़ी थी- १५ जनवरी १९९२। इसे पढ़ते हुए कुछ पुरानी स्मृतियाँ भी उछल-कूद कर गईं। इसे केवल मेरी प्रारम्भिक रचनाओं के रूप में देखें.

गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे।

रात भर महफिलों को सजाते रहे।

सबने देखी हमारी हंसी और हम-

आंसुओं से स्वयं को छुपाते रहे।

सुर्ख फूलों के आँचल ये लिख जायेंगे-

हम बनाते रहे वो मिटाते रहे।

रेत पर नक्शे-पा छोड़ने की सज़ा

उम्र भर फासलों में ही पाते रहे।

सबने यारों पे भी शक किया है मगर-

हम रकीबों को कासिद बनाते रहे।

हमको आती है यारो! ये सुनकर हंसी-

"वो हमारे लिए दिल जलाते रहे। "

नीली आंखों के खंजर चुभे जब उन्हें-

दर्द में "कृष्ण" के गीत गाते रहे।

सोमवार, 1 जून 2009

ग्रीष्म सप्तक

भीषण गर्मी पड़ रही है ......... इस मौके पर सात दोहे प्रस्तुत हैं। ये सभी दोहे अपने आप में स्वतंत्र हैं किन्तु समेकित रूप में ये ग्रीष्म ऋतु के एक पूरे दिन का चित्रण करने का प्रयास हैं...... प्रयास की सफलता का मूल्यांकन आप करेंगे ना-??????
दोहे निकल पड़ा था भोर से पूरब का मजदूर।
दिन भर बोई धूप को लौटा थक कर चूर।

पिघले सोने सी कहीं बिखरी पीली धूप।
कहीं पेड़ की छाँव में इठलाता है रूप।

तपती धरती जल रही, उर वियोग की आग।
मेघा प्रियतम के बिना, व्यर्थ हुए सब राग।

झरते पत्ते कर रहे, आपस में यों बात-
जीवन का यह रूप भी, लिखा हमारे माथ।

क्षीणकाय निर्बल नदी, पडी रेत की सेज।
"आँचल में जल नहीं-" इस, पीडा से लबरेज़।

दोपहरी बोझिल हुई, शाम हुई निष्प्राण।
नयन उनींदे बुन रहे, सपनों भरे वितान।

उजली-उजली रात के, अगणित तारों संग।
मंद पवन की क्रोड़ में, उपजे प्रणय-प्रसंग।

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शुक्रवार, 29 मई 2009

चार मिसरे

चार मिसरे समाद फरमाएं-


हमने जो ख्वाब थे सजा डाले-

देख लो-वक़्त ने मिटा डाले।

आरजू अब सुपुर्दे-खाक करो-

मैंने सारे वो ख़त जला डाले.

बुधवार, 27 मई 2009

चार मिसरे-

चार मिसरे-

मैं तुम्हारे ख़्वाबों का इक जहां बनाऊंगा।

प्यार के मुरीदों का कारवां बनाऊंगा।

मुझको तेरी साँसों की फूल सी छुवन की कसम-

लौट के अगर आया- आसमां बनाऊंगा.

रविवार, 8 मार्च 2009

मेरी पिछली ग़ज़ल में रदीफ़ "दो" था और इस ग़ज़ल में भी यही रदीफ़ है. दोनों "दो" के अर्थ अलग अलग हैं. बताइयेगा की इस तज़रबे में मैं कितना कामयाब रहा- पेशे-नज़र है ये ग़ज़ल-

ग़ज़ल : कोई हमदम या...............

कोई हमदम या कोई कातिल दो।
मेरी कश्ती को एक साहिल दो.

अब तो तन्हाइयां नहीं कटतीं-
दे रहे हो तो दोस्त-महफ़िल दो।

चांदनी में झुलस रहा है बदन
अब अमावस की रात झिलमिल दो।

उनकी मासूमियत का क्या कहना-?
दिल मिरा ले के कहें- "अब दिल दो."

मुझको बख्शा है ग़र भटकना,
तो-
मेरे पांवों को अब न मंजिल दो।

दोस्ती कर के देख ली मैंने-
एक दुश्मन तो मेरे काबिल दो-!

जिल्लतें, वस्ल, दर्द, तन्हाई-
कुछ तो मेरी वफ़ा का हासिल दो.

होली की अनंत अशेष शुभकामनाएं...........

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

एक ग़ज़ल : "रोक पाएंगीं क्या ........."

रोक पाएंगीं क्या सलाखें दो-?
जब तलक हैं य' मेरी पांखें दो ।

जिसने सबको दवा-ए-दर्द दिया-
आज वो माँगता है- साँसें दो ।

चाह कर भी निकल नहीं सकता-
मुझको घेरे हुए हैं बाँहें दो ।

वो इबादत हो या की पूजा हो-
एक मंजिल है और राहें दो ।

मुझको कोई बचा नहीं पाया-
मेरी कातिल- तुम्हारी आँखें दो ।

या तो आंसू मिलें, या तन्हाई-

एक जुर्म की नहीं सजाएं दो ।

शनिवार, 17 जनवरी 2009

एक ग़ज़ल:इक मुसाफिर ने.....

एक ग़ज़ल प्रस्तुत है-

इक मुसाफिर ने कारवां पाया।

कातिलों को भी मेहरबां पाया.

मेरे किरदार की शफाक़त ने-

हर कदम एक इम्तिहाँ पाया।


जुस्तजू में मिरी वो ताक़त है-

तुझको चाहा जहाँ-वहाँ पाया।


वो जो कहते हैं-मिरे साथ चलो

उनके क़दमों को बेनिशां पाया।


इक सितारा निशात का टूटा-

दर्द में हमने आसमां पाया.

बुधवार, 14 जनवरी 2009

एक ग़ज़ल


सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी।

जिंदगी जीने की ऐसी बेबसी अच्छी लगी।

इस नुमाइश ने दिखाए हैं सभी रंजो-अलम-

इस नुमाइश की हमें ये तीरगी अच्छी लगी

हैं वसीले और भी, फितरत-बयानी के, लिए

पर हमें नज्मो-ग़ज़ल, ये शाइरी अच्छी लगी।

आलिमों ने इल्म की बातें बताईं हैं बहुत-

पर हकीकत में हमें दो-चार ही अच्छी लगी।

ख्वाहिशें सबकी कभी पूरी नहीं होतीं मगर-

जो तुम्हारे साथ गुज़री, जिंदगी अच्छी लगी।

आज इन हालत में भी हैं मेरे हमराह वो-

कुछ चुनिन्दा लोग- जिनको रोशनी अच्छी लगी।

सोमवार, 8 दिसम्बर 2008

स्वर्गीय राजीव सारस्वत को श्रद्धांजलि

ताज होटल मुंबई में हुए आतंकी हमले में हिन्दुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड में राजभाषा प्रबंधक के पद पर कार्यरत श्री राजीव सारस्वत की मृत्यु हो गई। वे वहाँ संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण दौरे के सम्बन्ध में बनाए गए नियंत्रण कक्ष में थे। विस्तृत समाचार हेतु ये लिंक देखें-

http://hindikhabarein.blogspot.com/2008/12/poet-rajeev-saraswat-is-no-more.html

स्वर्गीय राजीव सारस्वत को श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति व उनके परिवार-जनों को यह दुःख सहने की शक्ति दे।

शनिवार, 6 दिसम्बर 2008


साहित्य "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" का अनुगामी बने : ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज।



भारतीय मनीषा में भगवान् आदि-शंकराचार्य का अवतरण एक अलौकिक व विलक्षण घटना है। उन्होंने तत्कालीन समाज में फ़ैली कुरीतियों रूढियों और कुंठाओं को अपने अगाध ज्ञान और विश्वास के बल पर छिन्न-भिन्न कर भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचरण किया. उनके द्वारा प्रदीप्त किया हुआ ज्ञान का अखंड दीप आज भी अपने भरपूर उजास से हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहा है.



दिनांक १२ नवम्बर २००८ का वह पुन्य दिवस था जब मुझे श्री आनंद कुमार मिश्र (जबलपुर) तथा श्री रंगनाथ दुबे (अलाहाबाद) के आत्मीय सहयोग से अलाहाबाद में परम पूज्य अनंत श्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज के पुन्य दर्शन करने व उनके अमृत वचन श्रवण करने का सौभाग्य मिला। महाराजश्री का बाल-सुलभ स्मित हास व उनका सहज व्यवहार मन को गहरे तक छू गया.

महाराजश्री के श्रीचरणों में बैठ कर मैंने अपनी कुछ जिज्ञासाएं और प्रश्न उनके सामने रखे जिनका उन्होंने समाधान किया। चर्चा के दौरान जीवन, जगत और साहित्य से जुडी उनकी चिंताएं अभिव्यक्त हुईं. इस वार्तालाप के संपादित अंश प्रस्तुत हैं.

आनंदकृष्ण : महाराजश्री के श्रीचरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए मैं स्वयं को अत्यन्त गौरवान्वित और सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा हूँ। आज के समय में प्रायः प्रत्येक भारतीय अपने समाज के अतीत के वैभव और वर्तमान की अधोगति को देख कर व्यथित और क्षुब्ध है. इस पतन का कारण क्या है ?

महाराजश्री : भारतीय परम्परा की शिक्षा का अभाव, रहन-सहन, व्यवहार, परिधान में अपनी परम्परा को त्याग कर विदेशियों का अन्धानुकरण, और भौतिकता की और दौड़ना ही वर्तमान में हमारे विघटन औत ह्रास के प्रमुख कारण हैं। हमें फिर से अपनी ही परम्परा को अपनाना होगा, उसे जगाना होगा. आज आपको मेरी बात कटु और अप्रिय लग सकती है किंतु भविष्य में हम सबको सोचना पडेगा कि हम अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी संस्कृति को फिर से अपनाएँ उसे सम्मान देन और उसमें अपनी आस्था जगाये तभी हमारा समाज अपने अतीत के गौरव को पुनः संभाल सकेगा.

आनंदकृष्ण : " साहित्य समाज का दर्पण है" तो आपकी दृष्टि में साहित्य कैसा होना चाहिए-?

महाराजश्री : आपने बहुत अच्छी और ऊंची बात उठाई है। "साहित्य" को अपने व्यापक अर्थ में शब्द की शुद्धि के साथ शब्द की गरिमा, और दार्शनिकता को समेटते हुए उसे सरस बनाने की कला का रूप होना चाहिए. साहित्य में दार्शनिकता होना चाहिए, उसमें एक स्पष्ट दर्शन, और जीवन शैली की सम्यक व्याख्या होना चाहिए. इसके साथ उसमें ऐतिहासिकता हो, जिससे वह साहित्य अपने रचनाकाल के बाद भी प्रासंगिक रहे. उसमें व्याकरण की विधि-सम्मत शुद्धता होना चाहिए और इन सबके साथ उसमें सरसता होना चाहिए.

आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! कृपया बताने की कृपा करें कि ये सारे गुण समाज में होंगे तो साहित्य में आयेंगे या साहित्य में होंगे तो समाज में आयेंगे-?

महाराजश्री : हाँ ! ये आवश्यक है कि साहित्य के द्वारा निर्धारित किए गए आदर्शों का समाज के द्वारा पालन किया जाए और उसका अनुसरण किया जाए और फिर समाज से ये मूल्य साहित्य में स्वतः ही पुनः प्रवेश करते जायेंगे। इस तरह इन शाश्वत मूल्यों का अनंत चक्र चलता रहेगा. साहित्य समाज से भिन्न रह कर नहीं चल सकता और समाज साहित्य से अलग हो कर नहीं रह सकता. दोनों अन्योन्याश्रित हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं. जिस साहित्य का अनुसरण समाज करेगा वही भविष्य का साहित्य कहलायेगा. इसलिए आज के साहित्यकारों से मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि उन्हें सृजन के समय विशेष रूप से सावधानी रखना चाहिए. उनका रचा हुआ एक ग़लत शब्द भयंकर दुष्परिणामों का वाहक हो सकता है. शब्द को इसीलिये तो "ब्रह्म" कहा गया है.

आनंदकृष्ण : जी ! साहित्य को हम किस तरह समाजोपयोगी बना सकते हैं?
महाराजश्री : साहित्य में, जैसा कि मैंने पहले कहा, कि साहित्य में शब्द की शुद्धता, दार्शनिकता, और ऐतिहासिकता के साथ सरसता अत्यावश्यक तत्व हैं. जैसे "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियं" में "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" ये भाग शब्द की शुद्धि, दार्शनिकता, और ऐतिहासिकता का परिचायक है और "न ब्रूयात सत्यमप्रियं" ये साहित्य के परिप्रेक्ष्य में सरसता की और संकेत है.
आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! साहित्य में प्रायः यथार्थ और आदर्श का टकराव दिखाई देता है और यही टकराव समाज में भी दिखता है. कई बार यो यथार्थ होता है उसका आदर्श के साथ ताल-मेल नहीं होता और जो आदर्श होते हैं वे कई बार अव्यावहारिक होते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए-?
महाराजश्री : ! वही "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" । सत्य अर्थात यथार्थ और प्रिय अर्थात आदर्श. दोनों के मध्य समन्वय और संतुलन स्थापित करना आवश्यक है- साहित्य में भी और जीवन में भी. अब जैसे आपने साहित्य की बात की तो साहित्यिक रचनाएं जैसे नाटक हैं, उपन्यास हैं, कविता है- तो बिल्कुल यथार्थ ले कर चलेंगे तो सही होगा क्या-? और इनमें कोरा आदर्श होगा तो उसे कौन पढेगा-? तो आदर्श और यथार्थ में संतुलन होना आवश्यक है. और यह संतुलन बनने की कला ही सच्ची कला है- साहित्य में भी और जीवन में भी.

आनंदकृष्ण : हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के क्या प्रभाव हुए हैं।?

महाराजश्री : मेरा मानना है कि इस देश की राष्ट्रभाषा तो संस्कृत ही है, भले ही उसे घोषित नहीं किया गया है। हिन्दी तो संस्कृत से निकली बोली है. देश के बड़े भू-भाग में हिन्दी बोली जाती है इसलिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने से देश में वैचारिक एकता तो आई है किंतु यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाता तो देश में सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता में और वृद्धि हुई होती.

आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! आप देश की जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे-?

महाराजश्री : साहित्य के माध्यम से हम अपनी संस्कृति का सम्मान करें, उसकी यशोगाथा सुनाएँ और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें. मीडिया को सतर्क रहना चाहिए पिछले दिनों में मीडिया ने " हिंदू आतंकवाद" शब्द बहुत उछाला है. मैं बताना चाहता हूँ कि हिंदू न कभी आतंवादी था और न ही उसकी पृकृति ही आतंकवादी की है. ये झूठे और प्रायोजित प्रचार तत्काल बंद होना चाहिए. देश को, समाज को एक बना कर रखें. भाषा, प्रांत, जाती के नाम पर अलगाववादियों के षड्यंत्रों को समझें और उनसे बचें।

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शुक्रवार, 14 नवम्बर 2008

लघुकथा :

नींद


उनके घर पुत्री जन्म का समाचार सुन कर मैं उन्हें बधाई देने जा पहुंचा-
................ मैंने देखा- नवजात कन्या चैन से सो रही है और उसके माता-पिता की आंखों से नींद उड़ने लगी है..........
(रचना- ०३-०५-१९९५)