शुक्रवार, 17 जून 2011
आटोग्राफ (कविता)
मैंने
सूखे, हरियाली विहीन
धुप में शान से सर उठाये खड़े
पहाड़ के चित्र पर हस्ताक्षर कर दिए-
अपने आटोग्राफ की तरह-
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बुधवार, 29 दिसम्बर 2010
राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) में मुक्तिबोध रचना शिविर
इस कार्यक्रम कि विस्तृत रिपोर्ट जल्दी ही ..........
रविवार, 5 सितम्बर 2010
- दरवाजा चमरौधे सी आवाज करता बंद हुआ और कुछ क्षणों के बाद पुनः खुला - अपने पीछे एक पूर्ण युवा शरीर के अस्तित्व को विमुक्त करता हुआ - सा -
- शरीर के अन्दर आते ही दरवाज़ा अपनी आदत के अनुसार फिर से बंद हो गया..........
- शरीर मशीनी अंदाज़ में अनावृत्त हुआ तब तक सिर का संकोच भी पर्याप्त समाप्त हो चुका था । उसने शरीर को लोलुप दृष्टि से घूरते हुए बातें करना प्रारंभ किया ।
‘‘तुम्हारा नाम - ?’’
‘‘नाम जानकर क्या करोगे ? जल्दी काम निबटाओ जिसके लिए जेब हल्की की है ।’’
‘‘.................... । ’’ कुछ क्षणों का सन्नाटा -
‘‘ तुम यह काम छोड़ क्यों नहीं देतीं - ?’’
‘‘तो क्या होगा ? पेट फिर भी रोटी मांगेगा । फिर यहां नहीं तो कहीं और ...... । ’’
‘‘शादी ............ ?’’
‘‘किससे ............ ?’’
‘‘मुझसे । ’’ सिर पूरे आत्मविश्वास से बोला ।
- अनावृत्त जिस्म का रोयां रोयां व्यंग्य से खिलखिला उठा - ‘‘ शादी तुम करोगे किससे- ? इससे .. ? इससे .... ? या इससे ....... ?’’ जिस्म ने जैसे अपने सारे अंगों की नुमाइश लगा दी ।
- सिर हत्प्रभ रह गया । जिस्म ने खिलखिलाते हुए ही सिर को अपनी ओर खींच लिया और बैड-स्विच आफ कर दिया ।
- सरसराहटें .......... ।
- गुरगुराहटें ........... ।
- गरमाहटें .............. ।
- सन्नाटे में गूंजते झींगुरों की आवाज़-सी सांसें ............ ।
- आवाज़ें दर आवाज़ें -
- सिर चलने को ही था तभी जिस्म से ठंडी आवाज़ उभरी- ‘‘शादी करोगे मुझसे - ?’’
- सिर थम गया । उसके सामने पूरा समाज, परिवार, मित्रमंडली घूम गई और इन सबके बोझ से वह धीरे-धीरे झुकता गया । अचानक वह बिना कुछ बोले बाहर की ओर तेजी से बढ़ गया ।
....... उसका पीछा कर रही है जिस्म की तीखी धारदार खिलखिलाहट - अपने अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ।
सोमवार, 21 जून 2010
गीत
तुम बिन जग से मेले रीते ।
सूने पथ, अंधियारी गलियां, हालाहल सा पीते।
आशाएँ बस खेल खिलातीं,
सपनों की दुनिया दिखलातीं,
और प्रतीक्षा अंत न पाती -
उजड़ा-उजड़ा इक-इक दिन भी, बरस-बरस सा बीते ।
बालू के घर ज्यों ढह जाते,
शंख-सीपियां बह-बह आते,
सतत कहानी कहते जाते -
जीवन भर हम रहे हारते, आंसू ही बस जीते ।
कैसी है इस मन की माया,
जिसने बस तृष्णा को गाया,
पर दुनिया ने ये सिखलाया -
बोलो । सबको मिल पाते हैं, साथ कहां मनचीते ?
रविवार, 20 जून 2010
गीत प्रेम का...........
एक अच्छी खबर ये है कि मेरे परिचय के दायरे में एक उत्साही युवा श्री राजेश कुमार सोनी शामिल हुए हैं। उन्होंने मेरे सारे लेखन को टाइप करने का बीड़ा उठाया है..... इसके लिए उन्होंने काग़ज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों को तक इकट्ठा किया है और उसे टाइप कर रहे हैं...... वे कृतिदेव में टाइप कर रहे हैं जिसे मैं यूनिकोड में परिवर्तित करके आप तक पहुंचाउंगा.......
तो लीजिये प्रस्तुत है ये गीत जो सन १९८९ की किसी धूल भरी गर्मी की ढलती शाम में मेरे भीतर कहीं करवटें लेता हुआ जागा था................
पीडाओं का बोझा ढोते -
ढोते देह दोहरी हुई है ।
संत्रासों की तेज धूप में
खोती जाती प्यास मुई है ।
अपनी झलक दिखा जाता है ?
कभी उमड़ती अलस भाव से -
कभी क्षितिज में खो जाती हैं ।
कुछ सुधियां ऐसी भी हैं जो-
शांत भाव से सो जाती हैं ।
भाषा नई सिखा जाता है ।
शनिवार, 25 जुलाई 2009
गीत: शब्द वही हैं ....
शब्द वही हैं, बदल गई है केवल अर्थों की भाषा ।
झूम-झूम नर्तन करते थे, नीलगिरि के उंचे पेड़-
अनगिन बिखरे तारों का शामें हंस स्वागत करती थीं ।
पीड़ा के बादल ने आंसू से लिख डाली परिभाषा ।
जिस दिन बहुत दूर से हमने झलक तुम्हारी पाई थी ।
नागपाश जैसी वेणी में बंध-हमने आकाश छुआ-
तन-मन में बिजली सी कौंधी-यौवन की अंगड़ाई थी।
श्वासों के संगम में हमको चेतनता के रंग मिले ।
उड़ते फिरते वनपाखी-से, रूप तुम्हारे संग मिले ।
मन के शिलालेख पर जाने किसने है यह दर्द तराशा ?
नव पल्लव का स्वागत करने मचल उठें सारी कलियां-
पंखुरियों पर प्रणय गीत हो ऐसा फूल कहीं खिल जाए।
पूनम की रातों में हम-तुम साथ रहें-बस पास रहें ।
और तुम्हारी पलकों में ही खिले खिले मधुमास रहें ।
इस निर्मम दुनिया में मैंने की जब सुख की अभिलाषा ।
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बृहस्पतिवार, 23 जुलाई 2009
चाहे ना हो साथ तुम्हारा,
हाय ! अधूरी मेरी पाती,
मंगलवार, 21 जुलाई 2009
सोमवार, 15 जून 2009
एक और ग़ज़ल भेज रहा हूँ। इस पर तारीख पड़ी है- 22-09-1991. आप सबकी प्रतिक्रया का इंतज़ार रहेगा.....
जैसे बर-बह्र शाइरी देखी।
हमने ऐसी भी बेबसी देखी।
है सितारा बुलंद किस्मत का-
नींद- तेरा बड़ा है शुकराना
यूँ हुआ इल्म मुक़म्मल अपना-
सोमवार, 8 जून 2009
"मंच" पर वज्रपात का दिन
आज का दिन "मंच" पर वज्रपात का दिन है। आज की सुबह ह्रदय द्रावक समाचार लाई है. एक सड़क दुर्घटना में मंच के लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड सिंह गुज्जर का निधन हो गया और ओम व्यास तथा ज्ञानी बैरागी गंभीर रूप से घायल हुए हैं.
एक शोक सूचना और- वरिष्ठ रंग-कर्मी हबीब तनवीर का भोपाल में ८६ वर्ष की उम्र में निधन हो गया. रंगमंच की एक महत्वपूर्ण कठपुतली को जगत-नियंता ने वापस बुला लिया.हबीब तनवीर जी, आदित्य जी, नीरज पुरी जी, और लाड सिंह गुज्जर जी को श्रद्धांजलि और ओम व्यास तथा बैरागी जी शीघ्र स्वस्थ हों यही कामना.
एक ग़ज़ल : "गीत गाते रहे.........."
आज कुछ पुराने कागजात खंगालते वक्त एक पुरानी रचना मिली जिस पर तारीख पड़ी थी- १५ जनवरी १९९२। इसे पढ़ते हुए कुछ पुरानी स्मृतियाँ भी उछल-कूद कर गईं। इसे केवल मेरी प्रारम्भिक रचनाओं के रूप में देखें.
गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे।
रात भर महफिलों को सजाते रहे।
सबने देखी हमारी हंसी और हम-
आंसुओं से स्वयं को छुपाते रहे।
सुर्ख फूलों के आँचल ये लिख जायेंगे-
हम बनाते रहे वो मिटाते रहे।
रेत पर नक्शे-पा छोड़ने की सज़ा
उम्र भर फासलों में ही पाते रहे।
सबने यारों पे भी शक किया है मगर-
हम रकीबों को कासिद बनाते रहे।
हमको आती है यारो! ये सुनकर हंसी-
"वो हमारे लिए दिल जलाते रहे। "
नीली आंखों के खंजर चुभे जब उन्हें-
दर्द में "कृष्ण" के गीत गाते रहे।
सोमवार, 1 जून 2009
ग्रीष्म सप्तक
पिघले सोने सी कहीं बिखरी पीली धूप।
तपती धरती जल रही, उर वियोग की आग।
झरते पत्ते कर रहे, आपस में यों बात-
क्षीणकाय निर्बल नदी, पडी रेत की सेज।
दोपहरी बोझिल हुई, शाम हुई निष्प्राण।
उजली-उजली रात के, अगणित तारों संग।
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शुक्रवार, 29 मई 2009
चार मिसरे
चार मिसरे समाद फरमाएं-
हमने जो ख्वाब थे सजा डाले-
देख लो-वक़्त ने मिटा डाले।
आरजू अब सुपुर्दे-खाक करो-
मैंने सारे वो ख़त जला डाले.
बुधवार, 27 मई 2009
चार मिसरे-
चार मिसरे-
मैं तुम्हारे ख़्वाबों का इक जहां बनाऊंगा।
प्यार के मुरीदों का कारवां बनाऊंगा।
मुझको तेरी साँसों की फूल सी छुवन की कसम-
लौट के अगर आया- आसमां बनाऊंगा.
रविवार, 8 मार्च 2009
ग़ज़ल : कोई हमदम या...............
कोई हमदम या कोई कातिल दो।
अब तो तन्हाइयां नहीं कटतीं-
चांदनी में झुलस रहा है बदन
उनकी मासूमियत का क्या कहना-?
मुझको बख्शा है ग़र भटकना, तो-
दोस्ती कर के देख ली मैंने-
जिल्लतें, वस्ल, दर्द, तन्हाई-
होली की अनंत अशेष शुभकामनाएं...........
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
रोक पाएंगीं क्या सलाखें दो-?
जब तलक हैं य' मेरी पांखें दो ।
जिसने सबको दवा-ए-दर्द दिया-
आज वो माँगता है- साँसें दो ।
चाह कर भी निकल नहीं सकता-
मुझको घेरे हुए हैं बाँहें दो ।
वो इबादत हो या की पूजा हो-
एक मंजिल है और राहें दो ।
मुझको कोई बचा नहीं पाया-
मेरी कातिल- तुम्हारी आँखें दो ।
या तो आंसू मिलें, या तन्हाई-
एक जुर्म की नहीं सजाएं दो ।
शनिवार, 17 जनवरी 2009
एक ग़ज़ल:इक मुसाफिर ने.....
एक ग़ज़ल प्रस्तुत है-
इक मुसाफिर ने कारवां पाया।
कातिलों को भी मेहरबां पाया.
मेरे किरदार की शफाक़त ने-
हर कदम एक इम्तिहाँ पाया।
जुस्तजू में मिरी वो ताक़त है-
तुझको चाहा जहाँ-वहाँ पाया।
वो जो कहते हैं-मिरे साथ चलो
उनके क़दमों को बेनिशां पाया।
इक सितारा निशात का टूटा-
दर्द में हमने आसमां पाया.
बुधवार, 14 जनवरी 2009
एक ग़ज़ल
सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी।
जिंदगी जीने की ऐसी बेबसी अच्छी लगी।
इस नुमाइश ने दिखाए हैं सभी रंजो-अलम-
इस नुमाइश की हमें ये तीरगी अच्छी लगी
हैं वसीले और भी, फितरत-बयानी के, लिए
पर हमें नज्मो-ग़ज़ल, ये शाइरी अच्छी लगी।
आलिमों ने इल्म की बातें बताईं हैं बहुत-
पर हकीकत में हमें दो-चार ही अच्छी लगी।
ख्वाहिशें सबकी कभी पूरी नहीं होतीं मगर-
जो तुम्हारे साथ गुज़री, जिंदगी अच्छी लगी।
आज इन हालत में भी हैं मेरे हमराह वो-
कुछ चुनिन्दा लोग- जिनको रोशनी अच्छी लगी।
सोमवार, 8 दिसम्बर 2008
स्वर्गीय राजीव सारस्वत को श्रद्धांजलि
ताज होटल मुंबई में हुए आतंकी हमले में हिन्दुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड में राजभाषा प्रबंधक के पद पर कार्यरत श्री राजीव सारस्वत की मृत्यु हो गई। वे वहाँ संसदीय राजभाषा समिति के निरीक्षण दौरे के सम्बन्ध में बनाए गए नियंत्रण कक्ष में थे। विस्तृत समाचार हेतु ये लिंक देखें-
http://hindikhabarein.blogspot.com/2008/12/poet-rajeev-saraswat-is-no-more.html
स्वर्गीय राजीव सारस्वत को श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति व उनके परिवार-जनों को यह दुःख सहने की शक्ति दे।
शनिवार, 6 दिसम्बर 2008
भारतीय मनीषा में भगवान् आदि-शंकराचार्य का अवतरण एक अलौकिक व विलक्षण घटना है। उन्होंने तत्कालीन समाज में फ़ैली कुरीतियों रूढियों और कुंठाओं को अपने अगाध ज्ञान और विश्वास के बल पर छिन्न-भिन्न कर भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचरण किया. उनके द्वारा प्रदीप्त किया हुआ ज्ञान का अखंड दीप आज भी अपने भरपूर उजास से हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहा है.
दिनांक १२ नवम्बर २००८ का वह पुन्य दिवस था जब मुझे श्री आनंद कुमार मिश्र (जबलपुर) तथा श्री रंगनाथ दुबे (अलाहाबाद) के आत्मीय सहयोग से अलाहाबाद में परम पूज्य अनंत श्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी महाराज के पुन्य दर्शन करने व उनके अमृत वचन श्रवण करने का सौभाग्य मिला। महाराजश्री का बाल-सुलभ स्मित हास व उनका सहज व्यवहार मन को गहरे तक छू गया.
महाराजश्री के श्रीचरणों में बैठ कर मैंने अपनी कुछ जिज्ञासाएं और प्रश्न उनके सामने रखे जिनका उन्होंने समाधान किया। चर्चा के दौरान जीवन, जगत और साहित्य से जुडी उनकी चिंताएं अभिव्यक्त हुईं. इस वार्तालाप के संपादित अंश प्रस्तुत हैं.
आनंदकृष्ण : महाराजश्री के श्रीचरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए मैं स्वयं को अत्यन्त गौरवान्वित और सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा हूँ। आज के समय में प्रायः प्रत्येक भारतीय अपने समाज के अतीत के वैभव और वर्तमान की अधोगति को देख कर व्यथित और क्षुब्ध है. इस पतन का कारण क्या है ?
महाराजश्री : भारतीय परम्परा की शिक्षा का अभाव, रहन-सहन, व्यवहार, परिधान में अपनी परम्परा को त्याग कर विदेशियों का अन्धानुकरण, और भौतिकता की और दौड़ना ही वर्तमान में हमारे विघटन औत ह्रास के प्रमुख कारण हैं। हमें फिर से अपनी ही परम्परा को अपनाना होगा, उसे जगाना होगा. आज आपको मेरी बात कटु और अप्रिय लग सकती है किंतु भविष्य में हम सबको सोचना पडेगा कि हम अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी संस्कृति को फिर से अपनाएँ उसे सम्मान देन और उसमें अपनी आस्था जगाये तभी हमारा समाज अपने अतीत के गौरव को पुनः संभाल सकेगा.
आनंदकृष्ण : " साहित्य समाज का दर्पण है" तो आपकी दृष्टि में साहित्य कैसा होना चाहिए-?
महाराजश्री : आपने बहुत अच्छी और ऊंची बात उठाई है। "साहित्य" को अपने व्यापक अर्थ में शब्द की शुद्धि के साथ शब्द की गरिमा, और दार्शनिकता को समेटते हुए उसे सरस बनाने की कला का रूप होना चाहिए. साहित्य में दार्शनिकता होना चाहिए, उसमें एक स्पष्ट दर्शन, और जीवन शैली की सम्यक व्याख्या होना चाहिए. इसके साथ उसमें ऐतिहासिकता हो, जिससे वह साहित्य अपने रचनाकाल के बाद भी प्रासंगिक रहे. उसमें व्याकरण की विधि-सम्मत शुद्धता होना चाहिए और इन सबके साथ उसमें सरसता होना चाहिए.
आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! कृपया बताने की कृपा करें कि ये सारे गुण समाज में होंगे तो साहित्य में आयेंगे या साहित्य में होंगे तो समाज में आयेंगे-?
महाराजश्री : हाँ ! ये आवश्यक है कि साहित्य के द्वारा निर्धारित किए गए आदर्शों का समाज के द्वारा पालन किया जाए और उसका अनुसरण किया जाए और फिर समाज से ये मूल्य साहित्य में स्वतः ही पुनः प्रवेश करते जायेंगे। इस तरह इन शाश्वत मूल्यों का अनंत चक्र चलता रहेगा. साहित्य समाज से भिन्न रह कर नहीं चल सकता और समाज साहित्य से अलग हो कर नहीं रह सकता. दोनों अन्योन्याश्रित हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं. जिस साहित्य का अनुसरण समाज करेगा वही भविष्य का साहित्य कहलायेगा. इसलिए आज के साहित्यकारों से मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि उन्हें सृजन के समय विशेष रूप से सावधानी रखना चाहिए. उनका रचा हुआ एक ग़लत शब्द भयंकर दुष्परिणामों का वाहक हो सकता है. शब्द को इसीलिये तो "ब्रह्म" कहा गया है.
आनंदकृष्ण : जी ! साहित्य को हम किस तरह समाजोपयोगी बना सकते हैं?
आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! साहित्य में प्रायः यथार्थ और आदर्श का टकराव दिखाई देता है और यही टकराव समाज में भी दिखता है. कई बार यो यथार्थ होता है उसका आदर्श के साथ ताल-मेल नहीं होता और जो आदर्श होते हैं वे कई बार अव्यावहारिक होते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए-?
महाराजश्री : ! वही "सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात" । सत्य अर्थात यथार्थ और प्रिय अर्थात आदर्श. दोनों के मध्य समन्वय और संतुलन स्थापित करना आवश्यक है- साहित्य में भी और जीवन में भी. अब जैसे आपने साहित्य की बात की तो साहित्यिक रचनाएं जैसे नाटक हैं, उपन्यास हैं, कविता है- तो बिल्कुल यथार्थ ले कर चलेंगे तो सही होगा क्या-? और इनमें कोरा आदर्श होगा तो उसे कौन पढेगा-? तो आदर्श और यथार्थ में संतुलन होना आवश्यक है. और यह संतुलन बनने की कला ही सच्ची कला है- साहित्य में भी और जीवन में भी.
आनंदकृष्ण : हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के क्या प्रभाव हुए हैं।?
महाराजश्री : मेरा मानना है कि इस देश की राष्ट्रभाषा तो संस्कृत ही है, भले ही उसे घोषित नहीं किया गया है। हिन्दी तो संस्कृत से निकली बोली है. देश के बड़े भू-भाग में हिन्दी बोली जाती है इसलिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने से देश में वैचारिक एकता तो आई है किंतु यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाता तो देश में सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता में और वृद्धि हुई होती.
आनंदकृष्ण : महाराजश्री ! आप देश की जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे-?
महाराजश्री : साहित्य के माध्यम से हम अपनी संस्कृति का सम्मान करें, उसकी यशोगाथा सुनाएँ और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें. मीडिया को सतर्क रहना चाहिए पिछले दिनों में मीडिया ने " हिंदू आतंकवाद" शब्द बहुत उछाला है. मैं बताना चाहता हूँ कि हिंदू न कभी आतंवादी था और न ही उसकी पृकृति ही आतंकवादी की है. ये झूठे और प्रायोजित प्रचार तत्काल बंद होना चाहिए. देश को, समाज को एक बना कर रखें. भाषा, प्रांत, जाती के नाम पर अलगाववादियों के षड्यंत्रों को समझें और उनसे बचें।
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